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बाबरी मस्जिद ढहाने वाले बलबीर और योगेंद्र मुस्लिम बन गए हैं

अयोध्‍या में बाबरी मस्जिद विध्‍वंस के 25 साल पूरे हो गए। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहा दी गई थी। इस मौके पर जहां हिंदू संगठन शौर्य दिवस के रूप में मनाते हैं। वहीं मुस्लिम संगठन इस दिन को काला दिवस मानते है।

मस्जिद का ढांचा गिराने को कारसेवक ‘गर्व का क्षण’ मानते हैं, लेकिन उसमें से कई लोग ऐसे हैं जो ऐसा नहीं मानते। ढांचा ढहाने में शामिल रहे कुछ पूर्व कारसेवकों को अपने किये पर पछतावा है। जिसमें से तीन ने इस्‍लाम कबूल लिया है। रिपोर्ट के अनुसार, पानीपत के बलबीर सिंह उस समय शिव सेना के सदस्‍य थे। वह 6 दिसंबर, 1992 को मस्जिद ढहाने चढ़े थे। उनके साथ रहे योगेंद्र पाल सिंह ने भी बाद में इस्‍लाम अपना लिया। अब बलबीर को मोहम्‍मद आमिर और योगेंद्र को मोहम्‍मद उमर के नाम से जाना जाता है। दोनों ने कसम खाई है कि जो उन्‍होंने 6 दिसंबर को किया, उसका प्रायश्चित करने के लिए वे 100 मस्जिदों का निर्माण या मरम्‍मत करवाएंगे। हालांकि अभी तक दोनों ने 50 मस्जिदों के निर्माण व मरम्‍मत में सहयोग किया है।इसी मामले में उन्होंने बलवीर ने कहा कि मैंने और योगेन्द्र, दोनों ने, अयोध्या में श्री राम मंदिर का निर्माण करने की प्रतिज्ञा की थी, लेकिन अब 100 मस्जिदों का नवीनीकरण करके हमने अपने पाप धोने का वचन लिया है. बलबीर पूर्व में शिव सेना का एक नेता हुआ करता था. वो आरएसएस की विचारधारा से प्रेरित था और अपने शुरुआती दिनों के दौरान पानीपत की “शाखा” में नियमित रूप जाता रहता था. आज वो मुहम्मद आमिर के नाम से जाना जाता है.आपको बतादे कि 06 दिसंबर, 1992 को याद करते हुए बलबीर ने कहा हमें डर था कि हमें रोकने के लिए सेना का प्रयोग किया जाएगा लेकिन जमीन पर कोई अधिक या प्रभावी सुरक्षा नहीं थी और इसी बात ने हमें प्रेरित किया और हम मानसिक रूप से तैयार थे कि आज इसे को ध्वस्त कर दिया जाएगा. उसने सोनीपत और पानीपत के कई अन्य कार-सेवकों के साथ गुंबद को ध्वस्त करने के लिए ‘कुदाल और गैती’ का इस्तेमाल किया।

बलबीर (आमिर) को बाबरी मस्जिद का गुंबद तोड़ने वाले पहले कारसेवक के तौर पर जाना जाता है। इसके बाद उन्‍हें पानीपत में ‘हीरो’ जैसा स्‍वागत मिला था। वह अयोध्‍या से दो ईंटें लेकर आए थे जो अभी भी शिव सेना कार्यालय में रखी हैं।

जब बलबीर (आमिर) मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना कलीम सिद्दीकी को मारने के लिए देवबंद में थे, तब उनका मन बदल गया। मौलाना की धार्मिक बातें सुनकर बलबीर ने इस्‍लाम कबूलने का फैसला किया। हालांकि यह इतना आसान नहीं था। आमिर को पानीपत छोड़कर हैदराबाद में बसना पड़ा, जहां उन्‍होंने निकाह किया। अब वह इस्‍लाम की शिक्षा देने के लिए स्‍कूल भी चलाते हैं।

सिर्फ बलबीर और योगेंद्र ही नहीं, अन्‍य कारसेवकों ने भी शर्मिंदगी और ग्‍लानि दूर करने के लिए जो बन पड़ा, वो किया। अयोध्‍या में बजरंग दल के नेता रहे शिव प्रसाद भी उन्‍हीं में से एक हैं। शिव ने करीब चार हजार कारसेवकों को खुद ट्रेनिंग दी थी जिन्‍होंने बाद में बाबरी मस्जिद ढहाई।

साल भर बाद ही प्रसाद डिप्रेशन में चले गए। उन्‍होंने मनोचिकित्‍सकों, तांत्रिकों, संतों को दिखाया मगर शांति नहीं मिली। अगले पांच साल एकांत में बिताने के बाद वह नौकरी के लिए 1999 में शारजाह चले गया। वहां उन्‍होंने इस्‍लाम कबूल कर लिया और मोहम्‍मद मुस्‍तफा बन गए।

सुप्रीम कोर्ट करेगा आज अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद पर सुनवाई

इस समय पूरा देश जनता है कि आज से अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू होने जा रही है। इस मामले से जुड़ी कई याचिकाओं पर महत्वपूर्ण सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होंगी, जिनपर पूरी देश की निगाहें टिकी हुई हैं। पिछली सुनवाई में प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने साफ कर दिया था कि इस मामले की सुनवाई नहीं टाली जाएगी।

इतना ही नहीं शीर्ष न्यायालय की विशेष पीठ ने सुन्नी वक्फ बोर्ड व अन्य की इस दलील को खारिज किया था कि याचिकाओं पर सुनवाई अगले आम चुनावों के बाद हो। 5 दिसंबर को मुस्लिम पक्षकार की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा था कि मामले की सुनावाई के लिए इतनी जल्दी क्यों है, हालांकि विशेष पीठ ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वह आठ फरवरी से इन याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई शुरू करेगी

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