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मिर्च फसल की जानकारी

डॉ. हादी हुसैन खान

(शोध सहयोगी) कीट विज्ञान विभाग,क्षेत्रीय वनस्पति संगरोध केन्द्र,अमृतसर, पंजाब, भारत

डॉ. हुमा नाज़

(शोध सहयोगी)पादप संगरोध विभाग,वनस्पति  संरक्षण, संगरोध एवं संग्रह,निदेशालय, फरीदाबाद, हरियाणा, भारत

पुष्पेंद्र सिंह साहू

(एम.एस.सी. एग्रीकल्चर) कीट विज्ञान विभाग,शुआट्स, इलाहाबाद, भारत

फसल की जानकारी

Image result for मिर्च फसलमिर्च की खेती मुख्यतः नगदी फसल के रूप में की जाती है। इसकी खेती से लगभग 90 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर आमदनी होती है। मिर्च की खेती विविध प्रकार की मिट्टियों मे जिसमे की कार्बनिक पदार्थ पर्याप्त हो एवं जल निकास की उचित सुविधा हो, मे सफलतापूर्वक की जा सकती है। मिर्च की फसल जल भराव वाली स्थिति सहन नही कर पाती है। यद्यपि मिर्च को pH 6.5—8.00 वाली मिट्टी मे भी (वर्टीसोल्स) मे भी उगाया जा सकता है | मिर्च की खेती के लिये 15 – 35 डिग्री सेल्सियस तापमान तथा गर्म आर्द जलवायु उपयुक्त होती है। तथा फसल अवधि के 130 – 150 दिन के अवधि मे पाला नही पडना चाहिये।

वर्गीकरण एवं किस्मे: मिर्च की उगायी जाने वाली किस्मो की विभिनताओ के आधार पर पांच प्रमुख प्रजातियों में रखा जा सकता है।

  1. कैप्सिकम ऐनुअम
  2. कैप्सिकम पुफटेमेंस
  3. कैप्सिकम प्यूबेसेंस
  4. कैप्सिकम चार्इनीज।

मुख्य किस्मे

पूसा ज्वाला इसके फल लम्बे एवं तीखे तथा फसल शीघ्र तैयार होने वाली है। प्रति हेक्टेयर 15 से 20 क़्वींटल मिर्च (सूखी) प्राप्त होती है।

कल्याणपुर-1– यह किस्म 215 दिन में तैयार हो जाती है तथा 19 क़्वींटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त हो जाती है।

कल्याणपुर-2– यह किस्म 210 दिन में तैयार होती है तथा इसकी उपज क्षमता प्रति हेक्टेयर 15 क़्वींटल है।

कल्याणपुर चमन यह संकर किस्म है। इसकी फलियां लाल लम्बी और तीखी होती हैं। इसकी पैदावार एक हेक्टेयर में 25 से 30 क़्वींटल (सूखी) होती है।

कल्याणपुर चमत्कार– यह संकर किस्म है। इसके फल लाल और तीखे होते हैं।

पंजाब लाल– यह एक बहुवर्षीय किस्म है। यह मोजैक वायरस प्रततरोधी है। इसकी उपज क्षमता 47 क़्वींटल प्रति हेक्टेयर है।

पूसा सदाबहार– यह एक बारह- मासी किस्म  है जिनमे एक गुच्छे मे 6-22 फल लगते हैं। इसमें साल में 2 से 3 फलन होता है। यह  किस्म 150 से 200 दिन में तैयार होती है |

सिंदूर – यह किस्मे 180 दिन में तैयार होती है तथा इसकी उपज क्षमता प्रति हेक्टेयर 14 क़्वींटल है।

आंध्र ज्योति यह किस्म पूरे भारत में उगाई जाती है। इसकी उपज क्षमता प्रति हेक्टेयर 18 क़्वींटल है।

भाग्य लक्षमी यह किस्म सिंचित और असिंचित दोनों क्षेत्र में उगाई जाती है। असिंचित क्षेत्र में 10-15 क़्वींटल  एवं सिंचित क्षेत्र  में 18 क़्वींटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त हो जाती है।

जे-218– यह संकर किस्म है। इसकी उपज 15 क़्वींटल प्रति हेक्टेयर (शुष्क फल) प्राप्त होती है।

Image result for मिर्च फसलमिर्च की उन्नत किस्में:

काशी अनमोल (उपज 250 क्वि./हे.), काशी विश्वनाथ (उपज 220 क्वि./हे.), जवाहर मिर्च – 283 (उपज 80 क्वि./हे. हरी मिर्च.) जवाहर मिर्च -218 (उपज 18-20 क्वि./हे., सूखी मिर्च.) अर्का सुफल (उपज 250 क्वि./हे.) तथा संकर किस्म काशी अर्ली (उपज 300-350 क्वि./हे.), काषी सुर्ख या काशी हरिता (उपज 300 क्वि./हे.) का चयन करें। पब्लिक सेक्टर की एच पी एच-1900, 2680, उजाला तथा यू एस-611, 720 संकर किस्में की खेती की जा रही है।

खेती की तैयारी

जलवायु अच्छी वृद्धि तथा उपज के लिए उष्णीय और उप-उष्णीय जलवायु की आवश्यकता होती है। प्रतिकूल तापमान तथा जल की कमी से कालिया पुष्प एवं फल गिर जाते है।

भूमि– अच्छी  जल निकास वाली जीवांश युक्त दोमट भूमि सर्वोत्तम रहती है। असिंचित क्षत्रों की काली मिट्टी भी काफी उपज देती हैं। 3-4 बार जुताई करके खेत की तैयारी करें।

बुआई

बीजों को पहले नर्सरी में बोते हैं। शीतकालीन मौसम के लिए जून-जुलाई एवं ग्रीष्म मौसम के लिए दिसम्बर एवं जनवरी में नर्सरी में बीज बुआई करते हैं। नर्सरी की क्यारियों की तैयारी करके बीज को एक इंच की दूरी पर पंक्तियों में बोकर मिट्टी और खाद से ढक देते हैं। फिर पूरी क्यारियों को खरपतवार से ढक देना चाहिए। बीज को ज़मने के तुरंत बाद सायंकाल में खरपतवार को हटा देते हैं। बीज को थीरम या कैप्टॉन 2 ग्राम रसायन (दवा) प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर बुआई करना चाहिए।

बीज की मात्रा -एक हेक्टेयर मिर्च की खेती के लिए 1.25 से 1.50 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। मिर्च की ओ.पी. किस्मों के 500 ग्राम तथा संकर (हायब्रिड) किस्मों के 200-225 ग्राम बीज की मात्रा एक हेक्टेयर क्षेत्र की नर्सरी तैयार करने के लिए पर्याप्त होती है।

रोपाई – पौधे 30 से 35 दिन बाद रोपने योग्य हो जाते हैं। 60 से. मी.X 45 से. मी. एवं 45X 30 से. मी. की दूरी पर क्रमशः शीतकालीन एवं ग्रीष्मकालीन मौसम में रोपना चाहिए।

उपज – असिंचित फसल (सूखी मिर्च) : 5 से 10 क़्वींटल प्रति हेक्टेयर तथा सिंचित क्षेत्र की फसल से (सूखी मिर्च) : 15 से 25 क़्वींटल प्रति हेक्टेयर औसतन उपज  होती है। हरी मिर्च की औसत उपज : 60 से 150 क़्वींटल प्रति हेक्टेयर ।

 

सिचाई एवं अन्य क्रियाएँ

शीतकालीन मौसम के मिर्च के खेती में सिचाई की आवश्यकता बहुत कम होती है। सिचाई की आवश्यकता पड़ने पर दो-तीन सिचाई दिसंबर से फरवरी तक करनी पड़ती है। ग्रीष्मकालीन मौसम की खेती में 10 से 15 दिन के अंतराल पर सिचाई करनी चाहिए। मिर्च की अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए खेत को खरपतवार से मुक्त रखना अनिवार्य  है।

खाद एवं उर्वरक : 250-300 क्विंटल/हेक्टेयर गोबर या कम्पोस्ट, 100-110 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 50 कि.ग्रा. फास्फोरस एवं 60 कि.ग्रा./हेक्टेयर पोटाश की आवश्यकता होती है। कम्पोस्ट, फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नाइट्रोजन की आधी मात्रा रोपाई के पहले खेती की तैयारी के समय तथा शेष नाइट्रोजन को दो बार क्रमशः रोपाई के 40-50 एवं 80-120 दिन बाद दी जानी चाहिए।

कीट एवं रोग तथा प्रबंधन

थ्रिप्सयह भूरे रंग का बेलनाकर छोटे कीट होते हैं। व्यस्क एवं शिशु कीट दोनों ही पत्तियों को खुरचकर उनका रस चूसते हैं, जिससे पत्तियो पर सफेद छोटे-छोटे धब्बे बनते हैं। ज्यादा आक्रामक होने पर पत्तियो सिकुड़ जाती हैं।

प्रबंधन

  1. बिचड़ा की अवस्था में पौधों को नायलान की जाली से सुरक्षित रखें इससे भंगुड़ी / किकुडी रोग से सुरक्षा भी हो जाती है।
  2. फसल लगाने के कुछ दिन बाद ही पीला स्टिकि ट्रेप लगा देना चाहिए। लाही, सफेद मख्खी और थ्रिप्स कीट का पीला रंग से आकर्षण होता है।
  3. इमिडाक्लोरोपिड 17.8 एस०एल० का 1 मिलीलीटर या डाइमेथोएट 30 ई०सी० का 2 मिलीलीटर प्रति 3 लीटर पानी की डॉ से घोल बनाकर छिड़काव करें।

लाहीकीट हरे, भूरे, काले रंग का पंखविहीन एवं पंख युक्त छोटे कीट होते हैं। पार्थेनोजेनेसिस की क्रियाद्वारा यह अपनी संख्या को बढ़ाते रहते हैं एवं पौधों के कोमल भाग से रस चूसते रहते हैं।

प्रबंधन

  1. लेडीबर्ड विटिल, सिरफिडफ्लाई, क्राईसोपा इनके प्राकृतिक शत्रु हैं। मैना तथा गौरेया इनको चुनकर खाती हैं, इन्हें संरक्षित करें।
  2. 10-20 पक्षी बैठक प्रति हेक्टेयर लगायें।
  3. नीम आधारित जैविक कीटनाशी का 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें।
  4. प्रोफेनोफास 50 ई०सी० का 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोलबनाकर फसल पर छिड़काव करें।

सफेदमक्खी –यह सफेद रंग की पंखवाली मक्खी है, जो लगभग 1 मिलीलीटर लम्बी होती है तथा शरीर पीले रंग का होता है। शिशु एवं व्यस्क दोनों ही पत्तियों पर रह कर रस चूसते हैं। यह पौधों में लीफ कर्ल वाइरस का भी वाहक होते हैं।

प्रबंधन

  1. लेडीबर्ड विंटिल, सिरफिड फ्लाई, क्राईकोपा इनके विभिन्न अवस्थाओं के प्राकृतिक शत्रु हैं। इन्हें संरक्षित करें।
  2. खेत को खर-पतवार से मुक्त रखें।
  3. इमिडाक्लोप्रिड 17.8 ई०सी० का 1 मिलीलीटर प्रति 3 लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें।

डायबैक रोग – पौधों की फुनगी शुरू में ऊपर से नीचे की और गलने लगती है, जो बाद में काला पड़ जाता है और सूख जाता है। आर्द्रता अधिक होने पर रोग लगने की संभावना बढ़ जाती है। पके फलियों पर छोटा धब्बा बनता है, जो धीरे-धीरे बड़ा और सफेद हो जाता है। कुहासा वाले वातावरण में यह तेजी से फैलता है।

प्रबंधन

  1. ग्रसित खेत की उपज का व्यवहार बीज के रूप में नहीं करें।
  2. ट्राइकोडरमा से बीज एवं बीज स्थली का उपचार करें।
  3. खड़ी फसल में मैंकोजेब 75 घुलनशील चूर्ण का 2 ग्रामप्रति लीटर पानी में घोलबनाकर छिड़काव करें।

उखड़ा रोग – इस रोग में मिट्टी की सतह के ऊपर का तना भाग सिकुड़ का संकुचित हो जाती हैं। धीरे-धीरे पौधा मुरझाकर सूखा जाता है।

प्रबंधन

  1. फसल चक्र अपनायें।
  2. ट्राइकोडरमा से बीज का उपचार करें।
  3. पाँच किलोग्राम ट्राइकोडरमा से 50 किलोग्राम कम्पोस्ट या वर्मीकम्पोस्ट को उपचारित कर प्रति हेक्टेयर मिट्टी में मिलायें।

कटाई 

शाक या सलाद के लिए प्रयोग की जानेवाली मिर्च को हरी अवस्था में ही पूर्ण विकसित हो जाने पर तोड़ लेते हैं। शुष्क मसालों के रूप में प्रयोग की जाने वाली मिर्चों को पूर्णतः परिपक्व हो जाने पर तोड़ते हैं।

मिर्च का भण्डारण   हरी मिर्च के फलों को 7-10 से. तापमान तथा 90-95 प्रतिशत आर्द्रता पर 14-21 दिन तक भंण्डारीत किया जा सकता है। भण्डारण हवादार वेग मे करे। लाल मिर्च को 3-10 दिन तक सूर्य की तैज धुप मे सुखाकर 10 प्रतिशत नमी पर भण्डारण करे।

 

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