October 21, 2021
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फेसबुक से डेटा चोरी कर वोटर फिक्स के मामले में , बीजेपी-कांग्रेस ने एक-दूसरे पर लगाए आरोप

फेसबुक से डेटा चोरी कर वोटर को फिक्स के मामले में , बीजेपी-कांग्रेस ने एक-दूसरे पर लगाए आरोप

फेसबुक डाटा लीक मामला तूल पकड़ता हुआ नजर आ रहा है। इसी बीच पहली बार फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने चुप्पी तोड़ी। जुकरबर्ग ने फेसबुक पर पोस्ट लिखा है और अपनी गलती को स्वीकार किया है। उन्होंने अपने फेसबुक पोस्ट के जरिए अपनी सफाई दी और कहा कि कंपनी ने इस मामले में कई कदम उठाए हैं और भी सख्त कदम उठा सकती है। जकरबर्ग ने फेसबुक पर लिखा कि लोगों के डेटा को सुरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है, अगर हम इसमें असफल होते हैं तो ये हमारी गलती है। उन्होंने कहा कि हमने इसको लेकर पहले भी कई कदम उठाए थे, हालांकि हमसे कई गलतियां भी हुईं लेकिन उनको लेकर काम किया जा रहा है।  फेसबुक पर हमारी-आपकी जानकारियां लीक हो रही हैं. इस बात के सामने आने के बाद अमेरिका से भारत तक हंगामा बरपा हुआ है. देश में बीजेपी और कांग्रेस एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं. फेसबुक के भारत में 25 करोड़ से ज्यादा यूजर्स हैं. ऐसे में अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि फेसबुक के सहारे इस देश की राजनीति को किस कदर प्रभावित किया जा सकता है.

डाटा चोरी की कहानी इतनी जटिल है कि आम लोगों को मुश्किल से समझ में आ रही है. आइए आपको आसान भाषा में समझाएं कि फेसबुक ने आपके साथ क्या कर दिया है और कैसे लोगों की जानकारी चोरी करके अमेरिका में ट्रंप को चुनाव जितवा दिया गया. जैसे ही कोई फेसबुक पर अपना अकाउंट खोलता है वैसे ही शुरू  डाटा इकट्ठा करने का खेल शुरू हो जाता है. सबसे पहले साइनअप के लिए अपनी ईमेल आईडी देनी पड़ती है जिसके बाद डेट ऑफ बर्थ और सेक्स/जेंडर जैसी बाकी की जानकारी देने पर आपको इसमें लॉगइन करने की इजाजत मिलती है. लॉग इन करने से पहले ही आप खुद से जुड़ी तीन महत्वपूर्ण जानकारियां फेसबुक को दे चुके होते हैं.

इसके बाद आपसे आपकी कॉन्टैक्ट डिटेल मांगी जाती है जिसके पीछे हवाला ये दिया जाता है कि इसके जरिए आपको आपके दोस्तों से जोड़ा जाएगा. अगर आप बिना डिटेल दिए आगे बढ़ते हैं तो फेसबुक आपको याद भी दिलाता है कि फेसबुक दोस्तों के बिना बेकार है. अगले स्टेप पर आते ही फेसबुक आपसे आपकी फोटो मांगता है. आपकी जानकारी इकट्ठा करने का सिलसिला इसके बाद भी चलता रहता है.

आप किन ग्रुप्स में शामिल हुए या किन ग्रुपों को आपने इग्नोर किया. आपने किन पेजों को लाइक किया. सिर्फ इतना ही नहीं, किसी के अकाउंट पर क्लिक करते ही उसकी टाइमलाइन के अलावा एक अबाउट भी ऑप्शन आ जाता है. इसमें अबाउट के ऑप्शन में आप कहां काम करते हैं, आपने कहां से पढ़ाई की है, आप किस शहर में रहते हैं, आपका होमटाउन क्या है जैसी तमाम जानकारियां मिल जाती हैं.

मामला सिर्फ यहीं नहीं रूकता. आप कौन सी भाषा जानते हैं, आपके धार्मिक विचार क्या हैं, आपके राजनैतिक विचार क्या हैं, आपकी पारिवारिक स्थिति क्या है, आपके परिवार में कौन-कौन हैं, आप कौन सा खेल पसंद करते हैं, आपको कौन सा म्यूजिक पसंद है, आपके टीवी प्रोग्राम, आपकी किताबें हर चीज फेसबुक पूछता है.

जब आप फोटो अपलोड करते हैं तब फोटो अपने साथ बहुत सी जानकारी लिए होती है. यहां तक की फेसबुक अपने आप चेहरों को पहचान लेता है. आप कब कहां गए यानी लोकेशन जानने के लिए तो फेसबुक को पूछने की जरूरत भी नहीं पड़ती. यहां तक सब कानूनी है क्योंकि इसके लिए आपने फेसबुक को अनुमति दे रखी होती है.

इस डाटा का फेसबुक क्या करता है और कैसे हुआ ग़लत इस्तेमाल

इस वादे के साथ फेसबुक इस डाटा को अपने विज्ञापनों के लिए इस्तेमाल करता रहा है कि इसे किसी और के साथ साझा नहीं किया जाएगा. लेकिन पिछले कई सालों से एक बड़ा खेल चोर दरवाजे से खेला जाता रहा है. बहुत सी एप्लीकेशनस को फेसबुक ने इसे रोचक बनाने के लिए अपने प्लेटफॉर्म पर जगह दी. दुनिया के बाकी लोगों की तरह भारत में भी लोगों ने इन एप्लीकेशनस पर गेम्स खेले, मजाक भरी तस्वीरें और पोस्ट बनाए. लेकिन इसी बहाने सबने इस एप्लीकेशन्स को भी अपने डाटा के इस्तेमाल की इजाजत दे दी.

इन सबके बीच Cambridge Analytica नाम की ब्रिटिश कंपनी ने फेसबुक की एक कमजोरी ढूंढ निकाली. इसने फेसबुक के इस सारे डाटा को बिना अनुमति के पढ़ना शुरू कर दिया. जैसे आप कहां गए, आपने किस पेज, ग्रुप, या शख्स को लाइक किया. इसे नाम दिया गया डाटा हारवेस्टिंग. यानी जिस प्राइवेसी की बात फेसबुक करता रहा है उन सारे नियमों की Cambridge Analytica ने धज्जियां उड़ा दीं.

अब जरा सोचिए कि Cambridge Analytica को ये पता है कि कितने लोगों ने नरेंद्र मोदी का पेज एक महीने में लाइक किया और कितनों ने अनलाइक किया. उसे ये भी पता है कि राहुल गांधी के समर्थन वाले पोस्टों पर कितने लाइक आ रहे हैं और पहले कितने आते थे. कंपनी को ये भी पता है कि किस शहर में किस पार्टी के प्रति रूख क्या है और कितने शख्स किस पार्टी के लिए कट्टर हैं या कितने हवा के साथ चलते हैं. ये सारा डाटा इन कंपनियों के पास इकट्ठा हो जाता है. इसी हिसाब से पार्टियां अपनी रणनीति तय कर सकती हैं.

सिर्फ इतना ही नहीं, इन कंपनियों के पास हर व्यक्ति की एक पर्सनेलिटी प्रोफाइल तैयार हो जाती है. वो भी ईमेल और फोन नंबर के साथ. ऐसे में चुनाव से पहले असमंजस में पड़े लोगों को किसी खास पार्टी से जुड़े संदेश फोन और ईमेल के जरिए भेजा जा सकता है. यानी कंपनियां फेसबुक इस्तेमाल करने वाले के विचार को प्रभावित करने की ताकत रखती हैं. बताया जा रहा है कि इसी के सहारे अमेरिका में ट्रंप को राष्ट्रपति चुनाव तक जितवा दिया गया और यही चीज फेसबुक को सबसे खतरनाक बनाती है.

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