October 26, 2021
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शिक्षाकर्मियों के साथ अनुकंपा नियुक्ति के नाम पर हो रहा मजाक,,शर्त ऐसी शासन की कि अनुकंपा नियुक्ति दिवा स्वप्न के जैसा

शिक्षाकर्मियों के साथ अनुकंपा नियुक्ति के नाम पर हो रहा मजाक,,शर्त ऐसी शासन की कि अनुकंपा नियुक्ति दिवा स्वप्न के जैसा


बालोद- अनुकंपा नियुक्ति यानी वह सुविधा जिसके लिए कोई भी व्यक्ति सरकारी नौकरी का चयन करता है और सरकारी नौकरी को प्राइवेट नौकरी के ऊपर तरजीह देता है क्योंकि यदि उसके साथ किसी प्रकार की कोई दुर्घटना घट जाती है तो सरकार उस पर कृपा दिखाते हुए उसके परिजनों को अनुकंपा नियुक्ति प्रदान करती है और इस के बल पर उसका परिवार तहस-नहस होने से बच जाता है पेंशन और अनुकंपा नियुक्ति ही कुछ ऐसी सुविधाएं हैं जिसके चलते लोग सरकारी नौकरी प्राप्त करना चाहते हैं ताकि आकस्मिक परिस्थितियों में भी उनके परिवार को संबल मिल जाए लेकिन शिक्षाकर्मियों के मामले में ऐसी नीति बनाई गई है की कहने को तो उन्हें अनुकंपा नियुक्ति का लाभ मिल रहा है लेकिन वास्तविक स्थिति में इसे प्राप्त करना बहुत ही कठिन है ऐसे ही एक मामले में बालोद जिले में पदस्थ हिरामन दास बघेल जो कि सहायक शिक्षक पंचायत के पद पर शासकीय प्राथमिक शाला गोटाटोला में नियुक्त थे के निधन के बाद उनकी पत्नी ने अनुकंपा नियुक्ति हेतु आवेदन प्रस्तुत किया जिसके जवाब में मुख्य कार्यपालन अधिकारी बालोद ने उन्हें पत्र लिखते हुए कहा है की शासन के निर्देशानुसार बीएड/ डीएड  और टीईटी की डिग्री अनिवार्य है अतः इस पत्र के जारी होने के 3 वर्ष के समय सीमा के अंदर उपरोक्त डिग्रियां लेकर पुनः आवेदन प्रस्तुत करें और यदि इस समय अवधि में आप यह अहर्ता प्राप्त नही कर पाती हैं तो आप की आवेदन/दावेदारी स्वत: निरस्त हो जाएगी .

*शिक्षाकर्मियों को परिजनों को नहीं मिल पा रहा है लाभ, बन रहा अनुकंपा नियुक्ति का मजाक*

शिक्षाकर्मियों के निधन पर जब उनके परिजन अनुकंपा नियुक्ति हेतु आवेदन कर रहे हैं तो कुछ इसी प्रकार का पत्र जारी कर उनके आवेदन को लटका दिया जा रहा है सोचने वाली बात है कि यदि किसी शिक्षाकर्मी के परिजन के पास यह समस्त डिग्री होती तो फिर वह घर क्यों बैठता क्या वह पहले से ही नौकरी में नहीं होता, कायदे से तो परिजनों को नौकरी देकर विभागीय तौर पर यह अहर्ताएं पूर्ण करानी चाहिए तभी अनुकंपा शब्द का कोई मतलब रहेगा।

*व्यवहारिक रूप से भी 3 वर्ष में डिग्री प्राप्त करना अत्यंत मुश्किल*

पंचायत विभाग का हाल ऐसा है कि अधिकारी नीति नियम तो बना देते हैं पर उसके व्यवहारिक पक्ष पर कभी ध्यान ही नहीं देते, जैसे जिस बीएड/डीएड की बात की जा रही है वह किसी मुक्त विश्वविद्यालय से 3 साल में पाना असंभव है क्योंकि मुक्त विश्वविद्यालय में प्रवेश से पूर्व किसी विद्यालय में 2 वर्ष का शैक्षणिक अनुभव होना अनिवार्य है और वर्तमान परिदृश्य में केंद्र सरकार के नियमानुसार अप्रैल 2019 के बाद बिना डीएड बीएड वाला कोई भी शिक्षक देश की किसी भी स्कूल में नहीं पढ़ा सकता यानी अगर हीरामन दास बघेल की पत्नी पहले 2 साल किसी स्कूल में अध्यापन कार्य कराए यह भी संभव नहीं है और यदि अगर यह नियम नहीं होता तो भी 2 साल के अध्यापन के बाद 2 साल का डीएड कोर्स करने में ही उसे कुल 4 साल लग जाते हैं और b.ed के बाद B.Ed होता है उसे करने में तो अभ्यर्थी को 6 साल लग जाते हैं लेकिन यदि केवल डीएड ही की ही बात कर ली जाए तो उसे भी प्राप्त करने में कम से कम 4 साल लगते हैं।  रेगुलर कॉलेज में प्रवेश लेना ऐसे भी मृतक के परिजनों के लिए आसान नहीं होता क्योंकि पति के जाने के बाद उन्हें अपने परिवार और बच्चों को भी संभालना होता है इन तमाम कठिनाइयों की ओर शासन-प्रशासन का ध्यान शिक्षाकर्मी संघ कई बार आकृष्ट करा चुके हैं लेकिन इसके बावजूद शासन अपने अड़ियल रुख पर अड़ा हुआ है जिसके चलते शिक्षाकर्मियों के लिए नाम की तो अनुकंपा नियुक्ति है पर काम का कुछ भी नहीं।

*क्या कहना है शिक्षाकर्मी नेताओं का*

शासन के समक्ष इन सभी व्यवहारिक दिक्कतों को कई बार रखा जा चुका है बावजूद इसके शासन-प्रशासन ने कभी भी इस मामले में संवेदनशीलता नहीं दिखाई इसी का परिणाम है कि शिक्षाकर्मियों के परिजनों को उनके आकस्मिक निधन के बाद कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है और वह दर-दर भटकने को मजबूर हैं। कहने को तो शिक्षाकर्मियों के लिए अनुकंपा नियुक्ति लागू है पर लाभ 5% को भी नहीं हो पा रहा है शासन को इस विषय में गंभीरता से सोचना चाहिए क्योंकि अनुकंपा नियुक्ति का अर्थ ही कृपादृष्टि दिखाते हुए प्रदान की गई नियुक्ति होती है ।

– *संजय शर्मा, प्रदेश संचालक छत्तीसगढ़ पंचायत नगरीय निकाय शिक्षक मोर्चा*
शिक्षाकर्मी के निधन के बाद उनके परिजनों को 3 वर्ष के भीतर डीएड/बीएड और टीईटी उत्तीर्ण करने का नियम लागू करके अनुकंपा नियुक्ति का लाभ दिया जा रहा है जिसे इस समय सीमा में नियमों के चलते प्राप्त करना लगभग नामुमकिन है , शासन-प्रशासन नियम तो बना देते हैं पर उसके व्यवहारिक पक्ष का कभी भी ध्यान नहीं रखते यही कारण है कि शिक्षाकर्मियों को मिलने वाले अनेक लाभों से वंचित होना पड़ रहा है। अगर बघेल जी की पत्नी पूर्व में ही इतनी शिक्षित होती तो निश्चित तौर पर आज अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन नहीं देती और पूर्व से ही नोकरी में होती, शिक्षाकर्मियों के मामले में अनुकंपा नियुक्ति सिर्फ नाम का है काम का नहीं, शासन प्रशासन को इसके व्यवहारिक पक्ष पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।

*- विवेक दुबे, प्रदेश मीडिया प्रभारी, छत्तीसगढ़ पंचायत नगरीय निकाय शिक्षक मोर्चा*

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