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अपने पूर्वजों को याद करने और उनकी अतृप्त आत्मा को शांत करने के लिए हमारे धर्म शास्त्रों में बहुत से उपाय बताए गए हैं, जिन्हें श्राद्ध कहा जाता है और जो एक धार्मिक क्रिया है। इसे तर्पण भी कहते हैं। ये अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में 14, 15 या 16 दिनों का होता है। कहते हैं कि श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा प्रसन्न होती है और उनका आशीर्वाद बना रहता है। हर साल हिंदू तिथि में श्राद्ध की शुरुआत अश्विन मास के प्रतिपदा तिथि से होती है और समाप्ति अमावस्या को होती है। इस साल तिथि के घटने से श्राद्ध एक दिन कम हो गए हैं। इसलिए इस बार पितृ पक्ष 14 दिनों का होगा। ये 6 सितंबर से शुरू होकर 19 सितंबर को खत्म हो जाएगा।

तिथियों में घट-बढ़ के चलते इस बार पितृ पक्ष 15 दिन के बजाय 14 दिनों का ही रहेगा।

तिथियों में घट-बढ़ के चलते इस बार पितृ पक्ष 15 दिन के बजाय 14 दिनों का ही रहेगा। 5 सितंबर को अनंत चतुर्दशी पर गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन के अगले दिन 6 सितंबर को पूर्णिमा तिथि और प्रतिपदा तिथि एक साथ होने से 6 को प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध किया जाएगा।

पंचांग के अनुसार पितृ पक्ष की शुरुआत 7 सितंबर से हो रही है किन्तु इस दिन मध्यान्ह में प्रतिपदा न होने से एक दिन पहले छह सितंबर को ही प्रतिपदा का श्राद्ध किया जाएगा।

पितृ पक्ष में षष्ठी तिथि का क्षय हो रहा है, साथ ही त्रयोदशी व चतुर्दशी का श्राद्ध भी एक ही दिन मनाया जाएगा। अमावस्या तिथि दो दिन पड़ने से दो दिन 19 सितंबर को सर्वपितृ अमावस्या मनाएंगे वहीं 20 सितंबर को स्नान दान की अमावस्या मनाई जाएगी।

अमावस्या तिथि 19 सितंबर को दिन में 11.16 बजे लग रही है जो 20 को प्रातः 10.22 बजे तक रहेगी। इस लिहाज से इस बार पितृपक्ष 14 दिन का होगा। महालया भादों की पूर्णिमा से आरंभ होकर आश्विन कृष्ण अमावस्या तक रहेगी।

बुझती है पूर्वजों की प्यास, जब करते हैं तर्पण और श्राद्ध, इस बार हुई पितृपक्ष की तिथि कम

ज्योतिषी अुनसार मनुष्यों के लिए तीन ऋण बताए गए हैं। ये हैं-देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। पितृ पक्ष में माता-पिता के प्रति श्रद्धा का समावेश किया गया है। उनके ऋण से मुक्त न होने पर जन्म निरर्थक बताया गया है, इसीलिए सनातन धर्म में पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने को पितृपक्ष महालया की व्यवस्था की गई।

श्राद्ध और पिंडदान से जु़ड़ी बातें…
श्राद्ध से पहले कुछ बातों का ध्यान भी रखना चाहिए। मिट्टी के घर में पितरों की फोटो वाले स्थान को गाय के गोबर से लीपकर और पक्के मकान में उस स्थान पर गौ मूत्र का  छिड़काव श्राद्ध से पहले करें। फिर पूर्वज की तस्वीर पर सफेद फूलों की माला चढ़ाएं। ध्यान रहें कि पितृ पक्ष पूजन में लाल फूल व कुमकुम का इस्तेमाल न किया जाए।

पितरों की आत्मा की शांति के लिए हवन करें। अग्नि में पितरों को दूध, दही, घी, तिल व खीर अर्पण करें। हाथ में कुश, तिल और जल लेकर दक्षिण की ओर मुंह कर लें और उनकी मोक्ष प्राप्ति के लिए संकल्प लें। फिर पूर्वजों के लिए बनाएं गए भोजन के पांच हिस्से निकालें। इसमें एक गाय, कुत्ता, कौआ, चींटी और देवता का भाग होगा।

इसके बाद घर में एक या तीन व इससे अधिक ब्राह्मण को भोजन कराएं। यदि ब्राह्मण घर न आएं तो आप किसी मंदिर में जाकर भी उनका हिस्सा दान कर सकती हैं। भोजन के बाद उन्हें दक्षिणा जरूर दें।

श्राद्ध और पिंडदान से जु़ड़ी बातें…
पिंडदान का महत्व
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार पितरों की संतुष्टि के लिए पिंडदान जरूरी माना गया है। माना जाता है कि मृत्यु के बाद भी आत्मा सांसारिक मोह माया से अलग नहीं हो पाती। इसलिए वह प्रेत लोक में भी भटकती रहती है। आत्मा को पितृलोक भेजने के लिए पिंडदान (सपिंडन) करना चाहिए। पिंडदान में पके चावल, आटा, घी एवं तिल को मिलाकर उसके पांच पिंड बनाने चाहिए।

क्रिया पुरूषों द्वारा ही किया जाना चाहिए। इसे पुत्र, पोता, नाती, भाई, भतीजा, चाचा के लड़के एवं खानदान की 7 पुश्तें कर सकती हैं। श्राद्ध के समय धोती पहननी चाहिए और ऊपरी हिस्से में कोई वस्त्र नहीं पहनना चाहिए।
गरुण पुराण के अनुसार मृत्यु के तेरह दिन बाद शरीर से निकली आत्मा यमनपुरी पहुंचने के लिए निकलती है। ये भूख और प्यास से ग्यारह महीने तक भटकती है। फिर बारहवें महीने में वह यमनपुरी (यमराज के दरबार) पहुंचती है। इसलिए माना जाता है कि तर्पण व पिंडदान से आत्मा को संतुष्टि मिलती है।

विशेष तिथियां

-प्रतिपदा का श्राद्ध छह सितंबर

-मातृ नवमी 14 सितंबर (माता की मृत्यु तिथि ज्ञात न होने पर श्राद्ध का विधान)

-आश्विन कृष्ण चतुर्दशी (किसी दुर्घटना में मृत व्यक्तियों का श्राद्ध)

-सर्वपैत्री अमावस्या 19 सितंबर (मृतक की तिथि ज्ञात न हो या अन्य कारणों से नियत तिथि पर श्राद्ध न होने पर इस दिन श्राद्ध का विधान)

तारीख – श्राद्ध

06 सितंबर – प्रतिपदा का श्राद्ध

07 सितंबर – द्वितीया का श्राद्ध

08 सितंबर – तृतीया का श्राद्ध

09 सितंबर – चतुर्थी का श्राद्ध

10 सितंबर – पंचमी (भरणी) का श्राद्ध

11 सितंबर – अनुदया षष्ठी का श्राद्ध 12 सितंबर – सप्तमी का श्राद्ध

13 सितंबर – अष्टमी का श्राद्ध

14 सितंबर – नवमी (सौभाग्यवती स्त्रियों) का श्राद्ध

15 सितंबर – दशमी का श्राद्ध

16 सितंबर – एकादशी (इंद्रा एकादशी)

17 सितंबर – द्वादशी (संन्यासी, वैष्णव, यति का श्राद्ध)

18 सितंबर – त्रयोदशी व चतुर्दशी का श्राद्ध (शस्त्रादि से मृत व्यक्तियों का श्राद्ध)

19 सितंबर – अमावस्या श्राद्ध (सर्वपैत्री) व पितृ विसर्जन

 

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