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14 साल की नौकरी में किए 66 एनकाउंटर, 3 बार गोली भी लगी फिर भी करवाता है नक्सली एरिया में पोस्टिंग


अजीत ओगरे ने 1100 से अधिक ऑपरेशन का हिस्सा रह चुके हैं।भिलाई(छत्तीसगढ़)। कभी रायपुर की सड़कों पर ट्रक दौड़ाते थे, आज जंगल के भीतर इनकी उंगलियां बंदूक की ट्रिंगर दौड़ा रही हैं। 14 साल की नौकरी में 66 एनकाउंटर, कई हार्डकोर नक्सलियों को मार गिराया। तीन बार गोली भी लगी, बावजूद इसके नक्सल खात्मे का जुनून ठंडा नहीं पड़ा। मैदानी इलाके में पोस्टिंग के ऑफर मिले, पर हर बार जंगल के थाने चुने।

ऐसा है ड्राइविंग से टीआई तक का सफर
– नक्सल फ्रंट पर डटे हमारे प्रदेश के जवानों और युवाओं के लिए यह खबर ऊर्जा से भर देने वाली है। ये कहानी टीआई अजीत ओगरे की है।- कवर्धा जिले के नक्सल सूची में शामिल होने के बाद राजनांदगांव से निकलकर कवर्धा में नक्सल सेल की जिम्मेदारी संभालने करीब एक माह पहले पहुंचे हैं।- अजीत कभी हिंदुस्तान लीवर कंपनी में ट्रक चलाया करते थे, इसके बाद टैक्सी चलाई और फिर 2004 में एसआई बने।- इसके बाद से उन्हें बस्तर के घोर नक्सल इलाकों में पोस्टिंग मिलती गई, नौकरी को केवल नौकरी न मानकर उन्होंने नक्सल को राज्य की सबसे बड़ी समस्या मानी और इसके खात्मे के लिए डट गए।
नक्सल फ्रंट पर बेहतर काम को देख तीन साल में ही उन्हें एसआई से टीआई के रूप में पदोन्नति मिली।

अजीत नक्सल मोर्चों पर डटे जवानों को मोटिवेट भी करते हैं। उनके मोटिवेशन से जवानों को नई ऊर्जा मिलती है, और जंगल के तकलीफदायक जीवन में भी बेहतर कार्य के जब्जे के साथ डटे रहते हैं।
1100 से अधिक ऑपरेशन का हिस्सा रह चुके
– अजीत ओगरे नक्सलियों के खिलाफ चलने वाले 1100 से अधिक ऑपरेशन का हिस्सा रह चुके हैं। इसमें से ज्यादातर ऑपरेशन को उन्होंने ही लीड किया है। उन्हें तीन दफे नक्सलियों की गोली का भी शिकार होना पड़ा। अजीत को 4 बार राष्ट्रपति अवॉर्ड मिल चुका है, कीर्ति चक्र के लिए भी नाम प्रस्तावित है।
युवाओं को सिखा रहे, खुद को किस तरह से रखें मजबूत
– नक्सल फ्रंट पर लंबा समय बिताने के बाद भी अजीत की हिम्मत शुरुआती दिनों जैसी ही बनी हुई है। वे जिस हिस्से में भी कमान संभालते हैं, वहां के युवाओं को खुद को मजबूत रखने के लिए प्रेरित करते हैं।- अजीत के शब्दों से ही जंगल में कैंप बनाकर रह रहे जवानों की हिम्मत दोगुनी हो जाती है।

नक्सलियों में दहशत ऐसी कि खत्म करने बनाई टीम
– अजीत ओगरे के नाम से नक्सलियों में ऐसी दहशत है, कि अजीत को नक्सलियों ने अपनी हिट लिस्ट में चौथे नंबर पर रखा है।- अजीत को खत्म करने के लिए एक अलग से टीम भी बनाई है। अजीत को चार बार राष्ट्रपति अवॉर्ड मिला है। कीर्ति चक्र के लिए नाम प्रस्तावित किया गया है।

इन हिस्सों में कर चुके ड्यूट– अजीत ओगरे बस्तर के तमाम घोर नक्सल थानों के अलावा, नारायणपुर, कोंडगांव, सुकमा, मोहला, धमतरी इलाके में नक्सल फ्रंट पर काम कर चुके है।- इसके बाद हाल ही में अजीत को कवर्धा में नक्सल उन्मूलन के लिए सेल में जिम्मेदारी दी गई है।

जीवन का सबसे बड़ा और यादगार ऑपरेशन
– 2011 में धमतरी के सिहावा थाने में 10 लाख के इनामी नक्सली दंपति सोनू और कमला सरेंडर के बहाने आए।- इसके बाद वे थाने से हथियार लेकर फरार हो गए। दोनों को पकड़ने अजीत 13 दिनों तक जंगल की खाक छानते रहे।- इन 13 दिनों तक न तो वे नहाए थे और न ही बेहतर खाना खा पाए थे। 13 दिन जंगल में घूमने के बाद नक्सलियों से मुठभेड़ हुई और दंपति को मार गिराया गया।

बेहतर ढंग से करें टॉस्क- अजीत का कहना है कि जिंदगी में कठिन टॉस्क मिलना बड़ी ऑपरच्यूनिटी होती है। हम टॉस्क को बेहतर ढंग से पूरा करें। बस यही सक्सेस का मंत्र है।- कठिन से कठिन काम के लिए खुद को तैयार करें। चाहे फिर वो नक्सल फ्रंट हो या मैदानी इलाका।

मन में था, पुलिस बनकर नक्सलियों का खात्मा करना

– रायपुर के ही रहने वाले अजीत ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद रायपुर में तीन साल ड्राइविंग की। ट्रक चलाने के दौरान उन्हें कई बार नक्सल प्रभावित इलाकों में भी जाना पड़ता था।- तब नक्सल तांडव व दहशगर्दी में जीवन जी रहे लोगों से उनकी मुलाकात भी हुई। नक्सल प्रभावित इलाकों के कई गांवों से गुजरते रहे।- तभी से अजीत ने पुलिस बनकर नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई लड़ने की ठानी थी, इसके बाद दोस्तों के साथ मिलकर वे एसआई की भर्ती देने पहुंचे।

हर पोस्टिंग में साथ है पत्नी
– नक्सल इलाकों में पोस्टिंग के बावजूद अजीत को परिवार का पूरा साथ मिलता है। 39 वर्ष के अजीत की पत्नी हर पोस्टिंग में उनके साथ संवेदनशील क्षेत्रों में भी रही हैं।- अजीत ने बताया कि परिवार को साथ लेकर चलना ही उनकी ताकत है।- वे पुलिस जवान के अन्य युवाओं को भी बगैर किसी डर या भय के परिवार को साथ लेकर चलने की बात कहते है ताकि परिवार से दूर रहने का स्ट्रेस उन्हें प्रभावित करती है।

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