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कलेक्टर के निर्देश के बावजूद डीईओ ने नहीं दिया गरीब बच्चों को कक्षा पहली में प्रवेश

राजनांदगांव। वीवीआईपी जिले में शिक्षा का अधिकार प्रवेश में हुई गड़बड़ी की पोल खुलने के बावजूद जिला शिक्षा अधिकारी अपनी गलती को छिपाने में लगे हुए है। आरटीई वेब पोर्टल में दी गई जानकारी के अनुसार जिले के कुल 270 स्वीकृत प्राईवेट स्कूलों में से 255 प्राईवेट स्कूल ऐसे है, जहां कक्षा पहली में भी प्रवेश देना है। यह जानकारी वेब पोर्टल में स्वयं जिला शिक्षा अधिकारी ने दी है। इसके बावजूद जिले में आरटीई के अंतर्गत कक्षा पहली में प्रवेश को निरस्त कर दिया जाना न सिर्फ कानून का उल्लघंन है, बल्कि गरीब बच्चों के जीवन व भविष्य के साथ खिलवाड़ भी है। जिला शिक्षा अधिकारी जान-बुझकर प्राईवेट स्कूलों को लाभ पंहुचाने की नियत से लॉटरी निकलने वाले दिन यह ऐलान कर दिया कि जिले में कक्षा पहली में प्रवेश नहीं दिया जावेगा। कानून, कोर्ट और कलेक्टर के आदेश को ताक में रखकर मनमाने ढ़ग से जिले में काम करने वाले जिला शिक्षा अधिकारी अब चारों ओर से घिरते नजर आ रहे है। मामला जब दस्तावेजी साक्ष्य के साथ कोर्ट में जायेगा तो जिला शिक्षा अधिकारी की मुश्किले और बढ़ सकती है।
मा. उच्च न्यायालय, बिलासपुर ने अपने आदेश दिनांक 14.09.2016 में यह स्पष्ट कर दिया था कि आरटीई के अंतर्गत ज्यादा से ज्यादा गरीब बच्चों को प्रवेश दिया जाए।
पीएमओ और एनसीपीसीआर में भी हुई शिकायत
राजनांदगांव जिले में शिक्षा का अधिकार प्रवेश में हुई गड़बड़ी की शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग, नई दिल्ली तक पहंुच चुका है। छग पैरेंट्स एसोसिएसन के प्रदेश अध्यक्ष क्रिष्टोफर पॉल ने अब इस मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय और एनसीपीसीआर को तत्काल हस्ताक्षेप कर गरीब बच्चों को न्याय दिलवाने की गुहार लगाई है।
वर्सन…
गरीब बच्चों को अनावश्यक मानसिक कष्ट देना, जान-बुझकर उनकी उपेक्षा करना, उनके मौलिक अधिकारों का हनन करना अजमानतीय अपराध है। शायद इसकी जानकारी जिला शिक्षा अधिकारी को नहीं है।
*क्रिष्टोफर पॉल, प्रदेश अध्यक्ष-छत्तीसगढ़ पैरेंट्स एसोसियेशन*
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