July 25, 2021
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इदगाह पर अदा की गई बकरीद की नमाज, एक दूसरे के गले लग दी ईद की बधाई

इदगाह पर अदा की गई बकरीद की नमाज, एक दूसरे के गले लग दी ईद की बधाई

हरितछत्तीसगढ़-विवेक तिवारी

पत्थलगांव। पत्थलगांव में अंजुमन इसलामिया कमेटी द्वारा इदुल अजहा (बकरीद) के मौके पर इदगाह पर 22 अगस्त आज सुबह करीब 8.30 बजे नमाज अदा की गई। इस मौके पर इस्लाम धर्म के लोग भारी संख्या में उपस्थित होकर नमाज अदा कर देश में अमन चैन की दुआ मांगी। अंजुमन इस्लामिया के इमाम अल्ताफ रजा की अगुआई में नमाज अदा की गई।

बकरीद का महीना इस्लामिक कैलेंडर का आखिरी महीना होता है। रमजान के पवित्र महीने की समाप्ति के लगभग 70 दिनों बाद इसे मनाया जाता है, यह मुस्लमानों का एक प्रमुख त्यौहार है। इस्लाम इतिहास के मुताबिक इसकी कहानी इस्लमिक पैगम्बर इब्राहीम अलैहिस्सलाम के जमाने में शुरू हुई थी। वह हमेशा बुराई के खिलाफ लड़े, उनका ज्यादातर जीवन जनसेवा में बीता। 90 साल की उम्र तक उनकी कोई औलाद नहीं हुई तो उन्होने खुदा से इबादत की और उन्हें चांद से बेटा इस्माईल मिला। उन्हें सपने में आदेश आया कि खुदा की राह में कुर्बानी दो। पहले उन्होंने ऊंट की कुर्बानी दी, इसके बाद उन्हें सपने आया कि सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी दो, इब्राहिम ने सारे जानवरों की कुर्बानी दे दी। उन्हें फिर से वही सपना आया, इस बार वह खुदा का आदेश मानते हुए बिना किसी शंका के बेटे के कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने अपनी पत्नी हाजरा से बच्चे को नहला-धुलाकर तैयार करने को कहा। इब्राहिम जब वह अपने बेटे इस्माईल को लेकर बलि के स्थान पर ले जा रहे थे तभी इब्लीस (शैतान) ने उन्हें बहकाया कि अपने जिगर के टुकड़े को मारना गलत है। लेकिन वह शैतान की बातों में नहीं आए और उन्होंने आखों पर पट्टी बांधकर कुर्बानी दे दी। जब पट्टी उतारी तो बेटा उछल-कूदकर रहा था तो उसकी जगह बकर यानी बकरे की बली खुदा की ओर से कर दी गई। हजरत इब्राहिम ने खुदा का शुक्रिया अदा किया। इब्राहिम की कुर्बानी से खुदा खुश होकर उन्होंने पैगंबर बना दिया। तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि जिलहिज्ज के इस महीने में जानवरों की बलि दी जाती है। इसलिए बकरीद पर बकरे की कुर्बानी दी जाती है। वहीं मुस्लिम हज के अंतिम दिन रमीजमारात जाकर शैतान को पत्थर मारते हैं जिसने इब्राहिम को खुदा के आदेश से भटकाने की कोशिश की थी।

बकरीद के दिन अपनी किसी प्रिय चीज की अल्लाह के लिए कुर्बानी देनी होती है। बकरीद के दिन मुस्लिम समुदाय के लोग बकरे की कुर्बानी देते हैं। कुर्बानी के लिए बकरे को अपने घर में पाला-पोसा जाता है और उसका पूरा ख्याल रखा जाता है। इसके बाद बकरीद के दिन उसकी कुर्बानी अल्लाह के नाम दे दी जाती है। कुर्बानी बकरीद की नमाज पढ़ने के बाद दी जाती है। इस दिन मुस्लिम समुदाय के लोग नए कपड़े पहनकरईदगाह में नमाज पढ़ने जाते हैं। वहां नमाज पढ़कर एक दूसरे के गले लगते हैं और ईद की बधाई देते हैं। नमाज पढ़कर वापस घर लौटने के बाद बकरे की कुर्बानी दी जाती है। नमाज अदा करने के दौरान ईदगाह पर समुदाय से जुड़े स्थानीय व आसपास क्षेत्र के लोग काफी संख्या में मौजूद रहे.

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