August 5, 2021
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आज है नरक चतुर्दशी ऐसे करें यमराज की पूजा, जानेंं विधि और कथा धनतेरस के बाद दीवाली से पहले मनाते है नरक चतुदर्शी

आज है नरक चतुर्दशी ऐसे करें यमराज की पूजा, जानेंं विधि और कथा धनतेरस के बाद दीवाली से पहले मनाते है नरक चतुदर्शी
नई दिल्ली:दीवाली से एक दिन पहले जिसे छोटी दीवाली कहा जाता है, इसका शास्त्रों में विशेष महत्व माना जाता है। इसे नरक चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी, यम चतुर्दशी या फिर रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है। इस दिन मृत्यु के देव कहे जाने वाले यमराज की पूजा की जाती है। देशभर में दीपावली 19 अक्टूबर को मनाई जाएगी. घर-घर में मां लक्ष्मी की पूजा की जाएगी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि मां लक्ष्मी की पूजा से पहले यमराज की पूजा की जाती है? जी हां, दीपावली से एक दिन पहले नरक चतुर्दशी आती है. इसे लोग यम चतुर्थी भी कहते हैं. इस दिन यमराज की पूजा की जाती है. ये भी कहा जाता है कि इसी दिन बजरंगबली का भी जन्म हुआ था इसलिए यम चतुर्थी के दिन बजरंगबली की भी पूजा होती है.

क्या है यमराज की पूजा विधि?

मान्यता है कि दिवाली से एक रात सोने से पहले घर के बाहर एक पुराना चौमुख दिया जलाया जाता है. कुछ जगहों पर लोग घर से बाहर चौराहे पर भी यमराज के नाम का दिया जलाते हैं. कहा जाता है कि इस दिन घर के बाहर दिया जलाकर रखने से यमराज प्रसन्न होते हैं और घर में अकाल मृत्यु की संभावना टल जाती है.एक मान्यता ये भी है कि नरक चतुर्दशी के दिन घर के बाहर दीपक की रौशनी से पितरों को अपने लोक जाने का रास्ता नजर आता है. इससे पितर प्रसन्न होते हैं और धन-धान्य का आशीर्वाद देते हैं.

नरक चतुर्दशी के दिन क्या करें?

नरक चतुर्दशी के दिन शरीर पर तेल की मालिश करें और सुर्योदय से पहले स्नान करें. नहाकर साफ सुथरे कपड़े पहनकर दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके बैठ जाएं. इसके बाद इन मंत्रों का जाप करें.

ऊं यमाय नम:, ऊं धर्मराजाय नम:, ऊं मृत्यवे नम:, ऊं अन्तकाय नम:, ऊं वैवस्वताय नम:, ऊं कालाय नम:, ऊं सर्वभूतक्षयाय नम:, ऊं औदुम्बराय नम:, ऊं दध्राय नम:, ऊं नीलाय नम:, ऊं परमेष्ठिने नम:, ऊं वृकोदराय नम:, ऊं चित्राय नम:, ऊं चित्रगुप्ताय नम:

नतरेस के अगले दिन यानि कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को को नरक चतुर्दशी के रुप में जाना जाता है। इस दिन को कृष्ण चतुर्दशी, छोटी दिवाली, रुप चतुर्दशी, यमराज निमित्य दीपदीन के रुप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर को क्रूर कर्म करने से रोका। उन्होनें 16 हजार कन्याओं को उस दुष्ट की कैद से छुड़ाकर अपनी शरण दी और नरकासुर को यमपुरी पहुंचाया। नकरासुर वासनाओं के समूह और अहंकार का प्रतीक है। इसके बाद छुड़ाई हुई कन्याओं को सामाजिक मान्यता दिलवाने के लिए सभी को अपनी पत्नी के रुप में स्वीकार किया। इस तरह से नरकासुर से सभी को मुक्ति मिली और इस दिन से इसे नरकाचतुर्दशी के रुप में छोटी दिवाली मनाई जाने लगी। नरकचतुर्दशी दिवाली के पांच दिनों के त्योहार में से दूसरे दिन का त्योहार है। इस दिन के लिए मान्यता है कि इस दिन पूजा करने वाले को नरक से मुक्ति मिलती है।

इस दिन के लिए एक मान्यता ये भी है कि इस दिन कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की चौदस के दिन हनुमान जी ने माता अंजना के गर्भ से जन्म लिया था। इस प्रकार इस दिन दुखों और कष्टों से मुक्ति पाने के लिए हनुमान जी की पूजा की जाती है। इस दिन लोग हनुमान चालीसा और हनुमानअष्टक का पाठ करते हैं। मान्यता है कि इस दिन हनुमान जयंती होती है। इस हनुमान जयंती का उल्लेख वाल्मीकी रामायण में मिलता है। इस तरह से देखा जाए तो हिंदू पंचाग के अनुसार हनुमान जयंती का अवसर वर्ष में दो बार मनाया जाता है। इस दिन को छोटी दिवाली इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन दीप दान किए जाते हैं। घर के दरवाजे के बाहर दीपक लगाए जाते हैं। दिवाली के दिन की तरह ही इस दिन को भी खुशी और उमंग के साथ मनाया जाता है, इसलिए इस दिन को छोटी दिवाली के रुप में भी मनाया जाता है।

नरक चतुर्दशी और छोटी दिवाली के साथ इस दिन को रुप चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन के लिए एक मान्यता ये है कि एक हिरण्यगभ नामक एक राजा थे, उन्होनें राज पाठ छोड़कर अपना जीवन तर में व्यतीत करने का निर्णय लिया। उन्होनें कई वर्षों तक इतनी कठिन तपस्या करी कि उनके शरीर पर कीडे़ पड़ गए और उनका शरीर सड़ने लगा। हिरण्यगभ को इस बात का बहुत दुख हुआ कि उन्होनें अपनी व्यथा नारद मुनि से कही। इसके बाद नारद मुनि ने कहा कि योग साधना के दौरान आप अपने शरीर की स्थिति सही नहीं रखते हैं इसी के कारण आपका शरीर सड़ गया है। हिरण्यगभ ने इसका निवारण पूछा तो नारद मुनि ने बताया कि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन शरीर पर लेप लगा कर सूर्योदय से पूर्व स्नान करें और उसके साथ ही रुप के देवता श्री कृष्ण की पूजा करनी चाहिए। इसलिए इस दिन को रुप चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है।

ज्योतिषशास्त्र के मुहूर्त प्रणाली अनुसार काली चौदस की निश्चित पूजा का समय बुधवार दी॰ 18.10.17 रात 23:40 से लेकर गुरुवार दी॰ 19.10.17 रात 00:31 तक रहेगा। इस पूजन की अवधि 50 मिनट रहेगी। इस दिन दिशाशूल उत्तर व राहुकाल वास दक्षिण-पश्चिम में है अतः पूजन की श्रेष्ठ दिशा पश्चिम रहेगी। रात्रि में आद्या काली का विधिवत पूजन करें। सरसों के तेल का दीप करें, काजल से तिलक करें, लोहबान से धूप करें, बरगद का पत्ता चढ़ाएं। इमरती का भोग लगाएं तथा नारियल सिर से 7 बार वारकर समर्पित करें। पूजन के बाद इमरती चौराहे पर रखें।

आद्या काली पूजन मंत्र: कालिकायै च विद्महे श्मशानवासिन्यै धीमहि तन्नो अघोरा प्रचोदयात्॥

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