October 26, 2021
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कश्मीर में नई रणनीति की दरकार – संजय कपूर

अमरनाथ यात्रियों पर हुआ आतंकी हमला दुखद व दुर्भाग्यपूर्ण है। यह हमला तब हुआ, जबकि खुफिया एजेंसी पहले ही इसके प्रति आगाह कर चुकी थी। वैसे खुफिया एजेंसी आगाह न भी करती, तो भी ऐसे किसी हमले की आशंका थी। आखिर देश के जिस हिस्से में आतंकवाद चरम पर हो और लोग आक्रोशित हों, वहां बाहर से आए भक्तों का जनसमूह बेवजह हिंसा का शिकार बन भी सकता है। सरकार मानकर चल रही थी कि सुरक्षा एजेंसियों ने तीर्थयात्रियों की सुरक्षा के लिए जो इंतजाम किए हैं, वे पर्याप्त हैं, लिहाजा उसने इस यात्रा को रद्द नहीं किया। लेकिन अब लगता है कि वे उपाय नाकाफी रहे।

घटनास्थल से मिली रिपोर्ट्स के मुताबिक आतंकियों ने दरअसल एक पुलिस बूथ या बंकर को निशाना बनाया था। तभी वहां से गुजर रही तीर्थयात्रियों की यह बस आतंकियों व पुलिस की फायरिंग के बीच चपेट में आ गई। इसका मतलब यह है कि ये बस आतंकियों के निशाने पर नहीं थी, जैसा कि कश्मीरी पुलिस का भी कहना है। विचलित करने वाला दूसरा पहलू यह है कि गुजरात के तीर्थयात्रियों को ले जा रही यह बस अमरनाथ यात्रा बोर्ड में पंजीकृत नहीं थी। यानी यह बस वास्तव में एक सुरक्षित काफिले में नहीं चल रही थी। उपरोक्त तथ्य न सिर्फ अमरनाथ यात्रा बोर्ड के लचर प्रबंधन की ओर इशारा करते हैं, बल्कि खुफिया सूचना होने के बावजूद सुरक्षा व्यवस्था की चूक को भी दर्शाते हैं।

अफसोस कि इस घटना पर मीडिया के कुछ हलकों की प्रतिक्रिया भी जिम्मेदारीपूर्ण नहीं रही। मीडिया से एक ऐसे समाज में जिम्मेदार रिपोर्टिंग की अपेक्षा अपेक्षा की जाती है, जहां पर बहुसंख्यक समाज खुद को असुरक्षित महसूस करते हुए अल्पसंख्यकों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराता है। लेकिन मीडिया के कुछ हलकों में कहा गया कि इन तीर्थयात्रियों को जानबूझकर निशाना बनाया गया और वे सिर्फ ड्राइवर की मुस्तैदी की वजह से बच सके। उनकी इस कहानी में कई झोल हैं और ऐसी अनुपयुक्त रिपोर्टिंग न सिर्फ पत्रकारिता के लिए, बल्कि सरकार और सामाजिक सद्भाव के लिहाज से भी ठीक नहीं है। हम न भूलें कि इस तरह की बातों से सरकार के लिए नई मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं, जो देश के विभिन्न् हिस्सों में न सिर्फ अल्पसंख्यक, बल्कि बहुसंख्यक कट्टरता को भी काबू करने की कोशिश कर रही है।

बहरहाल, केंद्र सरकार ने बीते साल नवंबर में नोटबंदी की घोषणा करते वक्त इसका एक कारण यह भी बताया था कि इससे आतंकियों की फंडिंग पर लगाम लगेगी और कश्मीर घाटी में पत्थरबाजी जैसी घटनाएं रुकेंगी। यह तर्क भोथरा था, क्योंकि ये कश्मीर की समस्या के प्रति गलत समझ पर आधारित था। ऐसे कई लोग जिन्हें कश्मीर में अशांति की मूल वजह पता नहीं है और न ही वे यह जानते हैं कि आक्रोशित लोग सड़कों पर क्यों उतर रहे हैं, उनके लिए इस विचार को बेचना अपेक्षाकृत आसान होता है कि ये प्रदर्शनकारी पत्थर इसीलिए बरसाते हैं, क्योंकि उन्हें पाकिस्तान या कुछ इस्लामिक समूहों से इसके लिए पैसे मिलते हैं।यदि ऐसा होता तो बीते नवंबर में नोटबंदी की घोषणा के बाद घाटी में पत्थरबाजी की घटनाएं रुक जानी चाहिए थीं और अमन-चैन बहाल हो जाना चाहिए था। पर ऐसा नहीं हुआ। बल्कि हैरतनाक ढंग से कश्मीर में इसके बाद जो बड़े नोटों की बरामदगी हुई, वे फर्जी नहीं थे। ऐसे में यह साफ है कि कश्मीर के संदर्भ में इस तरह की कई काल्पनिक बातें चलती रहती हैं।कश्मीर के बारे में एक और तथ्य प्रचारित किया जाता है कि वहां हालिया महीनों में हुई हिंसक घटनाओं के पीछे पाकिस्तान है। यह सत्य है, किंतु पूर्ण-सत्य नहीं। हां, यह सच है कि पाकिस्तान कश्मीर में अशांति में ही अपना हित देखता है और आतंकियों की जब-तब घुसपैठ भी कराता रहता है, लेकिन हम इस तथ्य से भी इनकार नहीं कर सकते कि हालिया दौर में वहां बुरहान वानी (जो पिछले साल सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया) जैसे दिग्भ्रमित आक्रोशित युवा भी आतंकी मुहिम चला रहे हैं। इन कश्मीरी युवाओं को लगता है कि भारत में उनके लिए कोई जगह नहीं क्योंकि उन्हें जॉब नहीं मिलता और यदि वे देश के किसी और हिस्से में पढ़ाई-लिखाई या कारोबार के सिलसिले में जाते हैं तो उन्हें वहां से खदेड़ दिया जाता है। मसलन, उत्तराखंड के एक हिल स्टेशन मसूरी में स्थानीय दुकानदार संघ ने कश्मीरियों को वर्ष 2018 तक अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर वहां से चले जाने का अल्टीमेटम दिया है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो कश्मीरियों में अलगाव का भाव और बढ़ेगा और फिर हमारे पास हिंसा को शांत करने की एक ही रणनीति बचेगी- सैन्य शक्ति का सतत इस्तेमाल, जैसा कि इसराइल वेस्ट बैंक या गाजा पट्टी में फलस्तीनियों के खिलाफ करता है। लेकिन एक बहुलतावादी और बहुदलीय लोकतंत्र में ऐसी रणनीति के भी अपने जोखिम हैं। क्या हम वाकई कश्मीर की समस्या का समाधान चाहते हैं और यदि हां तो हमारी रणनीति क्या होनी चाहिए?

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