November 29, 2021
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तीर्थयात्रियों पर बर्बरता

जम्मू-कश्मीर में हुए किसी आतंकवादी हमले की निंदा घाटी के अलगाववादी नेता भी करें, तो समझा जा सकता है कि वो घटना कितनी जघन्य होगी। दहशतगर्दों ने अनंतनाग के करीब श्रीनगर-जम्मू राजमार्ग पर अमरनाथ तीर्थयात्रियों से भरी बस को निशाना बनाया, यह जानते हुए भी कि उसमें महिलाओं सहित ऐसे निहत्थे लोग सवार थे, जो दुर्गम रास्तों पर भारी कष्ट झेलते हुए अपनी आस्था के सुमन अनोखे शिवलिंग पर चढ़ाकर लौटे थे। इस बर्बरता ने सारे देश को झकझोर दिया है। मगर यहां ये बात अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए कि रक्तपिपासु जालिम तत्वों से इससे बेहतर कुछ उम्मीद करना निरर्थक है। इसलिए इस दुख की घड़ी में भी इस घटना से संबंधित दो पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। पहली बात यह कि बस संचालक और उसमें सवार यात्रियों ने अशांत क्षेत्रों में अपनाए जाने वाले सुरक्षा के मानक नियमों का उल्लंघन किया। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल ने कहा है कि निशाना बनी बस तीर्थयात्रा के कारवां का हिस्सा नहीं थी। यानी इसका पंजीकरण नहीं था। बस में मौजूद यात्रियों ने अमरनाथ यात्रा दो दिन पहले पूरी कर ली थी। उसके बाद श्रीनगर चले गए थे। सोमवार शाम बस बिना पुलिस सुरक्षा के श्रीनगर से जम्मू जा रही थी। यानी बस ने सात बजे शाम के बाद ना चलने के नियम का उल्लंघन किया। इसकी घातक कीमत चुकानी पड़ी। आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में ऐसी लापरवाहियां अक्सर खतरनाक साबित होती हैं।

बहरहाल, दूसरा पहलू इससे भी ज्यादा गंभीर है। सरकार और सुरक्षा बल सिर्फ यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते कि यात्रियों ने सुरक्षा कायदों की अनदेखी की। क्या ये घटना यह जाहिर नहीं करती कि हिफाजत का ऐसा माहौल बनाने में स्थानीय प्रशासन नाकाम है, जिससे लोग निर्भय और निश्चिंत होकर कश्मीर में घूम सकें? आतंकवादियों और उन्हें पनाह देने वाले लोगों पर शिकंजा कसने में राज्य की महबूबा मुफ्ती सरकार पूरी तरह अप्रभावी साबित हुई है। कश्मीर घाटी में आम हालात क्यों बहाल नहीं हो रहे हैं, देश के लोग यह सवाल केंद्र से पूछेंगे। देशभर के लोगों ने कश्मीर मसले पर केंद्र और राज्य सरकारों के हर कदम का पुरजोर समर्थन किया है। लेकिन अब वे नतीजा चाहते हैं। आखिर आतंकवादियों और अलगाववादियों को सख्ती से कुचलने और सीमापार बैठे उनके आकाओं के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई के लिए देश को कब तक इंतजार करना पड़ेगा? एनडीए सरकार के केंद्र की सत्ता में आने के बाद बेशक आतंकवाद से निपटने के तौर-तरीके बदले हैं। इसकी ही एक मिसाल सेना के एक वाहन में आत्मरक्षा में बांधे गए पत्थरबाज को दस लाख रुपए मुआवजा देने के जम्मू-कश्मीर मानवाधिकार आयोग के निर्देश को केंद्र द्वारा ठुकरा देना है। लेकिन ऐसे इरादों की सार्थकता तभी बेहतर ढंग से सिद्ध होगी, जब जमीनी हालात बदलें। तीर्थयात्रियों पर हुए ताजा हमले के मद्देनजर फिलहाल ऐसे बदलाव का भरोसा नहीं बंधता। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

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