November 29, 2021
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खईड़कोना तीर्थयात्रा का शुभारंभ,जाने क्यों मनाते है खईडकोना तीर्थ

खईड़कोना तीर्थयात्रा का शुभारंभ

21 नवम्बर को खईड़कोना में तीर्थयात्रा का आयोजन किया गया जिसमें हजारों की संख्या में  ईसाई विश्वासी अपने पूर्वजों को याद करके उनका नमन कर उनको श्रद्धांजलि दिए ऐसी मान्यता है कि उन्होंनेे ख्रीस्तीय विश्वास रूपी बीज को प्राप्त किया है। यह वह तिथि है जिसमें जशपुर की धरती पर प्रथम युखारिस्तीय समारोह मनाया गया था और इस एतिहासिक मिस्सा बलिदान में 56 विश्वासियों ने बपतिस्मा ग्रहण कर जशपुर के प्रथम ख्रीस्तीय बनने का गौवर प्राप्त किया था। इन 56 विश्वासियों में 13 कोरकोटोली के 42 खईड़कोना और 1 सुवाली के विश्वासी थे।

खईड़कोना (अस्ता, अजधा पल्ली) पहोड़ों के तराई में, एक कोने में बसा हुआ एक छोटासा गाॅव है। हरित वनों की गाद में बसा हुआ यह गाॅव जशपुर-इतिहास के पन्नों में अमिट बन गया। गंगला के खांइड़ एवं कोने में होने के कारण गाॅव का नाम खईड़कोना पड़ा, ऐसा माना जाता है। दूसरी ओर यहाॅ के विश्वासी कई धर्म सतावट के बावजूद अपने विश्वास में खड़े रहे इसलिए भी इस गाॅव को खईड़कोना कहना न्यायसंगत है।

इस अवसर पर इतिहास के पन्नों को झाॅक कर देखना पूर्वजों को सच्ची श्रद्धांजलि देना होगा। गुरुवार 14 जून 1906 को भान डेर लिंडन खूटाकोना (बरवे) के दौरे पर पहुॅचे थे। दो मील दूर कुछ लोग उनसे मिलने के लिए खुटाकोना पहुॅचे। उन्होंने फा. भान डेर लिंडन को खईड़कोना आने का निवेदन किया। वे आए, एक घण्टे रह कर वापस चले गये। फादर का खईड़कोना में प्रवेश करना गाॅव वालों के लिए महंगा पड़ा। रविवार 17 जून,1906 राजा के सिपाहियों ने करीब सौ लोगों को लेकर, रात लगभग 3 बजे, खईड़कोना को घेर लिया। दो वृद्धा औरतों और दो लड़कों को छोड़ गाॅव के सभी स्त्री-पुरुष और बच्चों को दो घंटे पैदल चला कर हड़कपुर भंडार लिया गया। वहाॅ लेकर सिपाहियों ने उन बेबस लोगों को खूब मारा-पीटा और तीन दिनों तक उन्हें भंडर में कैद रखा। इसके बाद सभी पुरुष, 25 मील दूर, जशपुर ले जाये गए एवं बच्चों और महिलाओं को वापस गाॅव भेज दिया गया।

खईड़कोना के ईसाइयों को राजा के दरबार में पेश किया गया। सिपाहियों ने उन्हें मारा-पीटा, धमकियाॅ दीं और उन्हें आतंकित किया। लोग इतना डर गये कि सबों ने वन रक्षक को पीटना कबूल कर लिया। गाॅव के पाॅच प्रमुख व्यक्तियों पर चार महीने जेल की सजा हुई। शेष 35 लोगों को प्रति व्यक्ति पाॅच रुपया जर्माना कर छोड़ दिया गया। जेल में सुकरा ने एक सिपाही से कहा कि वे उसे जान से मार डालें, परंतु वह ईसाई धर्म कभी नहीं छोड़ेगा। 

राजनीतिक प्रतिनिधि, श्री लाॅरी की मुलाकात जशपुर के शासक से 3 नवम्बर 1906 को रायपुर में हुई। 8 नवंबर 1906 को श्री लाॅरी ने महाधर्माध्यक्ष म्युलमन को सूचित किया कि जशपुर के शासक ने ईसाइयों को परेशान न करने और इस आशय के निर्देष अपने अधिकारियों को देने का वादा किया था। राजा ने अपने अधिकारियों को निर्देष दिया कि कुड़ुख़ आदिवासियों को किसी तरह परेशान न किया जाए। यह ज्ञात होने पर फा. भान डेर लिंडन अपने सहयोगी फा. ब्र्रेसर्स के साथ 20 नवबंर 1906 को खईड़कोना पहुॅचे। लोगों ने उनका उत्साह और उल्लासपूर्वक स्वागत् किया। अपनी एक झोपड़ी में उन्हें टिकने की जगह दी और रात भर उनकी रखवाली की। दूसरे दिन सुबह, 21 नवबंर 1906 को फा. भान डेर लिंडन और फा. जे. ब्रोसर्स ने उस झोपड़ी के आंगन में, जशपुर की धरती पर प्रथम ख्रीस्तयाग चढ़ाया। (तिथि-21/29 के बारे ईतिहासकारों के बीच कुछ मतभेद है। पर घटना के बारे में सहमति है।)

इस एतिहासिक घटना के समारोह का शुभांरम्भ गाॅव के गिरजा घर से भक्तिमय शोभा यात्रा द्वारा किया जाता है, जहाॅ प्रथम ख्रीस्तयाग चढ़ाया गया था, वहाॅ इस वर्ष करिश्माई प्रार्थना एवं पाप स्वीकार होगा।। यह विश्वास और श्रद्धांजलि की यात्रा साहेब कोना में समाप्त होती है। यह वह कोना है जहाॅ मिशनरी अपने घोड़ों को अपने प्रवास के दौरन बाॅधा करते थे और जहाॅ आज माता मरियम का सुन्दर ग्रोटो पहाड़ी पर बनाया गया है। साल पेड़ों की छाॅ तले, प्राकृतिक गालरी में विश्वासीण़ एकत्र  होते हैं। अतिथियों का स्वागत किया जाता है और पवित्र मिस्सा बलिदान चढ़ाकर ईश्वर और पूर्वजों को धन्यवाद और श्रधांजलि दी जाती है। समारोह का आरम्भ 10 बजे हुवा। मुख्यानुष्ठाता माननीय बिशप पौल लकड़ा, डी.डी. गुमला धर्मप्रांत, सह अनुष्ठाता एवं उपदेशक मानमीय बिशप यान डे ग्रोएफ, बेथलेहेम धर्मप्रांत साउथ अफ्रिका एवं माननीय बिशप एम्मानुएल केरकेट्टा, डी.डी. जशपुर धर्मप्रांत थे। मिस्सा में गाना संचालन की जिम्मेदारी पत्थलगाॅव डीनरी को दिया गया है, इसलिए इसकी इस वर्ष की तीर्थयात्रा में विशेष भूमिका है। शुभकामनाएं।जीवन विकास मैत्री, पत्थलगाॅव के संयोजक याकूब कुजूर ने बताया कि इस तीर्थयात्रा में जशपुर, रायगढ़, अम्बिकापुर, गुमला आदि धर्मप्रांतों से विश्वासीगण बड़ी संख्या में भाग लिए।

  

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