July 26, 2021
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मानव तस्करीः एक कलंक आईये जाने कैसे बचें इस जटिल समस्या से

मानव तस्करीः एक कलंक

मानव व्यापार या मानव तस्करी सभ्य समाज के लिए एक कलंक है। इसे आधुनिक दास्ता या गुलामी भी कहा जाता है। मानव का मानव द्वारा चंद लाभ के लिए व्यापार या तस्करी करना एक घृणिड़ धंधा है।  आदिवासी क्षेत्रों परिस्थिति बहुत गंभीर हैं।  इस लिए इस पर अंकूश लगाने के लिए रायगढ़ जिला प्रशासन औऱ पुलिस विभाग ने अपने संयुक्त अभियान के तहत 17 जनवरी, 2016 को कापू के हाईस्कूल मैदान में एक दिवसीय कार्यााला का आयोजन किया था। जिलाधीश अलरमेल मंगई डी, पुलिस अधिक्षक संजीव शुक्ला, एडीजे योगेश पारिक,विधिक साक्षरता सचिव सूर्यवंशी महिला बाल विकास संयोजक चेताली विवास और सरपंच कलिस्ता एक्का आदि ने हजारों की संख्या में उपस्थित स्कूलों बच्चों और ग्रामीण जनों को मानव तस्करी की विभिन्न पहलूओं को समझाया। जैसे मानव तस्करी क्या है, कैसे होता है, क्यों होता है, कौन करता है, कानून से कैसे बच जाता है, इस जाल से कैसे बचा जा सकता है इत्यादि बातें। दो स्कूली बच्चो ने भी मानव तस्करी पर अपना मार्मिक विचार व्यक्त किया।

मानव व्यापार या मानव तस्करी क्या है? मनुष्य का मनुष्य द्वारा पैसा कमाने के लिये खरीद-विक्री करना मानव व्यापार है। मनुष्य का मनुष्य द्वारा चोरी-छीपे खरीद-फरोख़्त मानव तस्करी है। चंद लाभ के लिए मनुष्य का मनुष्य द्वारा व्यापार। मानव व्यापार या तस्करी अमानवीय और गैर कानूनी है। यह धंधा घोर निन्दनीय और सभ्य समाज के लिये एक कलंक है।

मानव तस्करी कैसे होता है? यह चोरी-छिपे, धोखे, प्रलोभन, झाँसे व भ्रम के द्वारा होता है। एक व्यक्ति की कमजोरी, विवाता का लाभ उठाया जाता है। भोले भाले व गरीब दलित, आदीवासियों (बच्चों) को ाहरी चकाचैध, प्यार और शादी का झांसा देकर, अपहरण तथा धमकी देकर, रोजगार व मोटी रकम का सब्जबाग दिखाकर महानगरों, व्यापारिक एंव खतरनाक औधोगिक संस्थानों, होटल एंव पर्यटन स्थलों और वेयालयों में दलालों और अवैध व्यापारियों द्वारा तस्करी एवं खरीद-फरोख़्त किया जाता है। एजेण्ट लोग इन्हें महा नगरों के प्लेसमेंट एजेन्सियों तक लेकर बेच देते हैं। एक प्लेसमेंट एजेन्सी दूसरे प्लेसमेंट एजेन्सी को बेच देती है। प्लेसमेंट एजेन्सी में इनका मानसिक और देहिक शोषण होता है। भेड़ बकरियों की तरह छोटे-छोटे कमरों मे रखा जाता है। बीमार होन पर भी ईलाज नहीं कराया जाता है। इन्हें किसी परिवार के घरेलू काम के लिए या किसी संस्थान के काम के लिए बेच दिया जाता है। इनसे 12 से 18 घण्टे काम लिया जाता है, काम के घण्टे निश्चित नहीं होते हैं। ठीक से खाना तक नहीं दिया जाता हैं। सीढ़ी के नीचे, फर्श, बाथरूम या अन्य गंदे और असुरक्षित जगहों में बोरी बिछाकर सोने को मजबूर किया जाता है। काम नहीं जानने या  बीमार हाने पर भी मारपीट करके जबरदस्ती काम कराया जाता है। मालिकों से समझौता होता है कि कभी भी उन्हें मजदूरी न दी जाए सिर्फ एजेंटों ही दिया जाए। ये एजेंट थोड़ा पैसा इन्हें दे कर बाकी हड़प् लेते और उनकी कमाई के पैसे से ऐा करते हैं। इन लोगों की स्थिति बंधुआ मजदूर जैसी हो जाती है। चाह कर भी ये वहाँ से बाहर नहीं निकल पाते हैं। 

अगर कोई अपनी इच्छा से महानगर जाता है और कोई परिवार में घरेलू काम करता है या कृषि कार्य करता है या कोई संस्थानों में काम करता है और एवज में मजदूरी नहीं दी जाती, काम के घंटे निश्चित नहीं होते वहाँ से वह बाहर नहीं निकल सकता तो इसे भी मानव व्यापार ही कहा जायेगा।

एजेंट कौन होते हैं? दूसरे कोई नहीं, अपने ही लोग होते हैं, पीड़ितों के नजदीकी ही होते हैं। जो लोगों को बहला-फसला कर महानगर ले जाते हैं और प्लेसमेंट कहे जाने वाले बड़े गिरोहों को बेच देते हैं। और पुनः वापस आकर शिकार की तलास में जुट जाते हैं। ये अपने इस धंधे में इतने माहीर होते हैं कि लोगोें को भनक तक नहीं पड़ती है कि उनकी तस्करी हो रही है। दूसरी ओर पुलिस के भी छक्के छुड़ा देते हैं। क्योकि ये अकेले नहीं होते इनका देश विदेश में लम्बा-चौड़ा जाल बिछा होता है। बड़े ताकतवार होते हैं।

प्लेसमेंट क्या है? यह एक छोटा सा दुकान जैसा कमरा है, जहाँ नाम व पंजीयन क्रमांक अंकित होता है। नाम और क्रमांक भेड़ की खाल में भेड़िया होता है। जैसे शिवा प्लेसमेंट, संत मोनिका प्लेसमेंट, संत अन्ना प्लेसमेंट, इत्यादि महा पुरूषों और संतों के नाम। जिनके द्वारा लोगों का सहज विशवास जीत लिया जाता है। यह वह स्थान है जहाँ से लोगों को काम के लिए बेचा जाता है। पंजीयन क्रमांक फर्जी होता है। प्रशासन व पुलिस भी चकमा खा जाते हैं।

मानव तस्करी क्यों होता है? इसके दो घटक होते हैं, जिन्हें ’पुश (ढकेलना) और ’पुल’ (खींचना) कहा जाता है। लोगों को क्या इस धंधे की ओर ढकेल देता है। वह है गरीबी। दूसरा रोजगार की कमी। और तीसरा बच्चों में लक्ष्यहीनता। लोगों को क्या इस धंधे में खींच लेता है। वह है शहरी आर्कषण। दूसरा पैसा कमाने का अवसर। 

मानव तस्कर या एजेंट कैसे कानूनों से बच जाते हैं? संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मानवाधिकारों की सर्वभौम घोषणा का अनुच्छेद 4 मनुष्य के व्यापार एवं जबरन काम करने पर प्रतिबंध लगाता है। भारत का संविधान अनुच्छेद 23 मानव के दुव्यवहार और बलात्श्रम का प्रतिषेध करता है। भारतीय दंड सहिता की आराएं, पाॅकसो कानून 2012 और अनुसूचित जात/जनजाति पर अत्याचार निवारण अधिनियम,1989 संशोधित 2014 भी इस प्रकार के धंधों और कृत्यों को गैर कानूनी मानते हैं। इन कानूनों के होते हुए भी यह गोरक धंधा बुलंद है क्योंकि तस्कर बच जाते हैं। बचने के निम्न कारण हैं: 1. नाम बदला जाना-शहर में इनका नाम बदल दिया जाता है। ढूढ़ने में बहुत कठिनरई होती है। 2. काम का स्थान बदला जाना-पकडे़ जाने के भय से बार-बार बदल दिया जाता है।  3. बयान बदला जाना-पीड़ित और अभिभावक मौके पर अपना बयान बदल देते हैं, जिसके कारण तस्कार सजा से बच जाते हैं। तस्कारों जाल यहाँ तक भी पीछा नहीं छोड़ता है। किसी को भी अपने जाल में फंसाकर स्वयं बच निकलने की ताकत रखता है। दुसरी ओर कानूनों की खुद की सीमाएं हैं।

मानव तस्करी से कैसे बचें? बचने का पहला उपय है जागृति। इस धंधे की काले कारनामों को जाने पहचानें। अपने बच्चों को पढ़ायें, सिखायें, लक्ष्य निर्धारण करायें, अनुाासन में रखें। मानव तस्करी का शिकार न होने दें। गाँव में संदिग्ध व्यक्ति के आने पर पुलिस को सूचित करें। अगर रोजगार के लिए महानगर जाना हो तो ग्राम सभा में पंजीयन करायें। दूसरा, गरीबी को दूर करने के स्थानीय उपाय तलासें। रबी फसल और स्वरोजगार के धंधों का यतन करें। शासकीय योजनाओं का लाभ उठायें। मनरेगा के कार्यक्रमों को लागू करायें। समय पर मजदूरी के भुगतान की माँग करें। तीसरा, किसी के दबाव में आकर अपना बयान न बदलें। पुलिस और कानून भी पीड़ितों का साथ एवं सुरक्षा दें।

आइये हम सब मिलकर अपने क्षेत्र से मानव व्यापार की कलंक को सदा के लिए मिटा दें। इस वर्ष के संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित उद्देय को सफल बनाएं-’’किसी को न छोड़ो-महिलाओं और लकियों के प्रति हिंसा को समाप्त करो।’’

याकूब कुजूर

संयोजक

जीवन विकास मैत्री, पत्थलगाॅव

 

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