September 17, 2021
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दुबेः मुददे को जबरन दिया जा रहा तूल,शर्माःसरकार की दमनकारी नीति बनी घाव:सियासी वार-पलटवार हड़ताल के वक्त भी और हड़ताल के बाद भी

विरेंद्र दुबेः मुददे को जबरन दिया जा रहा तूल, संजय शर्माःसरकार की दमनकारी नीति बनी घाव,,
सियासी वार-पलटवार हड़ताल के वक्त भी और हड़ताल के बाद भी

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harit chhattisgarh raipur। जो भी हो, चाहे शिक्षाकर्मियों की हड़ताल का वापसी लेना अभी भी लोगों को हजम नही हो रहा है वहीं अब मोर्चों मे फूट नजर आने लगी है कुछ भी हो मगर छत्तीसगढ़ में जेल में बंद शिक्षाकर्मियों से रात को बातचीत करना और फिर उनका अचनाक हड़ताल से वापस लेना, सोचने को मजबूर करते हैं हड़ताल के बाद तो अब शिक्षाकर्मियो के संघ में ही फुट दिख रही है ।विदित हो की शिक्षाकर्मियों की मांगों पर एक साथ लड़ाई लड़ने के लिए 5 मोर्चों के प्रांताध्यक्षों ने मिलकर. छत्तीसगढ़ पंचायत एवं नगरीय निकाय शिक्षक संवर्ग संघ की स्थापना की थी, लेकिन अब इस संघ में फूट पड़ गई है। दरअसल शिक्षाकर्मियों की हड़ताल स्थगित होने के बाद सीएम ने संघ के नेताओं को बातचीत के लिए बुलाया था लेकिन सिर्फ वीरेन्द्र दुबे के नेतृत्व में उनका प्रतिनिधिमंडल ही बातचीत में शामिल हुआ। इसको लेकर 4 मोर्चों के प्रांताध्यक्ष नाराज हो गए हैं। प्रांताध्यक्ष संजय शर्मा और केदार जैन ने वीरेन्द्र दुबे पर व्यक्तिगत लाभ के लिए सीएम से मुलाकात का आरोप लगाया है। उनका ये भी कहना है, कि मुख्यमंत्री से मुलाकात मोर्चा का फैसला नहीं था। लिहाजा हजारों शिक्षाकर्मी आहत हैं। वहीं वीरेंद्र दुबे का कहना है, कि सीएम से मुलाकात सुबह से तय थी। सभी प्रांताध्यक्षों को सूचना भी दी गई थी। दुबे का ये भी कहना है, कि इस मुद्दे को जबरन तूल दिया जा रहा है। वहीं हड़ताल को लेकर सोशल मीडिया में प्रतिक्रियाओँ और सवालों का सिलसिला भी जारी है। इसी कड़ी में शिक्षाकर्मी मोर्चा के संचालक सदस्य संजय शर्मा ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट जारी किया है। जिसमें साफ किया गया है कि सरकार ने शिक्षा कर्मियों की कोई माँग नहीं मानी है आंदोलन छात्र हित-समाज हित में आँदोलन वापस लिया है।उन्होने लिखा है कि सरकार से न कोई उम्मीद है और न करेंगे। उन्होने यह भी लिखा है कि सरकार की दमनकारी नीति के कारण बहुत बड़ा घाव है जो अभी नहीं भर सकता। बहरहाल सियासी वार-पलटवार शिक्षाकर्मी हड़ताल के वक्त भी था और जब हड़ताल खत्म हो गई है तब भी है। सूकून की बात यही है कि स्कूलों में रौनक लौट आई है। पढ़ाई की गाड़ी पटरी पर दौड़ने लगी, लेकिन सवाल तो पूछे जाएंगे कि क्या गुरुजी को अचानक अपना कर्तव्य याद आ गया, या रमन सरकार ने उनके संविलियन की मांगें मान ली हैं। या फिर कहानी कुछ यूं तो नहीं है कि जैसा कि मध्य प्रदेश में मुरलीधर पाटिदार ने किया था। वो भी शिक्षाकर्मियों के हड़ताल का नेतृत्व कर रहे थे। मगर उन्हें बीजेपी ने विधानसभा चुनाव में टिकट दिया, वो विधायक भी बने। वहीं अब अगर छत्तीसगढ़ की बात करे तो हड़ताल खत्म होने के बाद शिक्षा कर्मी अपने -अपने स्कूलों में लौट आए हैं। उन्होने सामान्य ढंग से अपना काम- काज शुरू कर दिया है। हड़ताल के दौरान हुए पढ़ाई के नुकसान की भरपाई के लिए स्कूलों का टाइम टेबल बदले जाने का फरमान जारी हो चुका है। सरकार में बैठे लोग भी अपनी कामयाबी का ढिंढोरा पीट रहे हैं। मगर एक सवाल अभी भी लोगों के जेहन मे कि असल मुद्दा जो संविलियन का था, उसका क्या हुआ। आर-पार के मूड में जो शिक्षाकर्मी नजर आ रहे थे, परिवार के साथ प्रदर्शन करने को मजबूर हो गए और सरकार जो संविलियन के मुद्दे पर अड़ गई थी, शिक्षाकर्मियों को गिरफ्तार कर रही थी, सब अचानक पेक-अप कैसे हो गया।

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