September 24, 2021
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नगर का हृदय स्थल ही साफ नही, तो और स्थानों के क्या कहने

हरित छत्तीसगढ़ विवेक तिवारी पत्थलगाव। पत्थलगाव का हृदय स्थल कहे जाने वाले इंदिरा चैक पर कचरे का अंबार से उठने वाली बदबु से इस समय आम जन परेषान हैं। वहीं बस स्टैण्ड पर शौचालय के अभाव के कारण बस यात्री नगरपंचायत को कोसते नजर आते हैं। बस स्टैण्ड में शौचालय की ओर बात उठने पर जनप्रतिनिधी एवं नगरपंचायत के कर्मचारियों के द्वारा केवल निर्माण करने की बात ही कही जाती है परन्तु आज तक न तो कोई आगे आया और न ही इस ओर अभी तक कोई ध्यान दिया गया है।
विदित हो कि एक ओर जहां देेश के प्रधानमंत्री मोदी स्वच्छता के लिये स्वयं ही हाथ में झाड़ु लेकर साफ-सफाई करते नजर आते हैं। केन्द्र में नई सरकार बनने के बाद साफ-सफाई एवं कई ऐसी अनेक योजनाएँ मिशन के रूप में कार्यान्वित करने का बीड़ा उठाया गया है जो सीधे-सीधे देश के प्रत्येक व्यक्ति से जुड़ी हुई हैं। स्वच्छता को लेकर केन्द्र सरकार कितनी गंभीर है इसे अपने चारों ओर शासकीय एवं अर्धषासकीय कार्यों में देख सकते हैं। केन्द्र सरकार के स्वच्छ भारत अभियान ने देश के प्रत्येक व्यक्ति को स्वच्छता की ओर जागरुक किया है, और स्वच्छता को जिंदगी का हिस्सा बनाने के लिए भी प्रेरित भी किया गया है। इसी स्वच्छता अभियान के तहत नगर पंचायत, एल्डरमेन, कुछ पार्षदों के द्वारा समय-समय पर कचरे की पेटी देने के बाद भी उसके दुकान के सामने भी कचरे का ढेर लगा रहता है। चैक में रखे कचरे पेटी में लोग कचरा डालना तक उचित नही समझते। और इधर-उधर कचरे के डाल दिया जाता है। इसी में पत्थलगांव के हृदय स्थल पर कचरे के अंबार लगे रहने से एवं उससे उठने वाली बदबु से वहां से गुजरने वाले नगर पंचायत को कोसते नजर आते हैं। वहीं नागरिकों का कहना है कि जब नगर का हृदय स्थल का ही ये हाल है तो बाकी वार्डों का क्या हाल होगा। वहीं नगर के सब्जी मण्डी, बाजार पारा, एवं कई वार्ड ऐसे हैं जहां साफ-सफाई के अभाव में कचरे का अंबार लगा रहता है। इस ओर नगरपंचायत को ध्यानाकर्षण करते हुये सफाई करवाने की आवश्यकता है। वहीं दुसरी ओर आखिर इसकी जिम्मेदारी साफ-सफाई कर्मचारी एवं नगर प्रषासन की है या स्वयं की ? ये बात अपने आप में सोचने वाली बात है। शासन प्रषासन के साथ-साथ नगर को स्वच्छ एवं स्वथ्य रखने के लिये हमें भी ध्यान देने की आवश्यकता है।
शासन प्रषासन के साथ-साथ हमारी भी नैतिक जिम्मेदारी
गन्दगी फैलाने में समाज का हर वर्ग अपने आधार पर गन्दगी फैलाने का जिम्मेदार है। हर व्यक्ति अपनी सहूलियत के अनुसार स्वयं को दूसरों से बेहतर होने का दावा करता। हमें अपने जीवन में स्वच्छता पर भी विचार करने की जरूरत है कि स्वच्छता के प्रति हमारी सामाजिक भागीदारी भी है, और हम स्वच्छता के लिए उतने की जिम्मेदार हैं जितना सरकारी या अर्द्धसरकारी कर्मचारी। हमारी सोच साफ-सफाई में केवल घर के चार दिवारी तक ही सिमित रहती है। घर की सफाई के बाद उस कचरे को सड़को, नालियों या घर के बाहर कहीं भी डाल देते हैं। हमारी सोंच है कि घर के बाहर कचरा फेंकना ही हमारी जिम्मेदारी है, उसके बाद उस कचरे से होने वाली गंदगी एवं उससे होने वाली बिमारी का जिम्मेदार हम शासन प्रषासन को दे देते हैं। कहने का मतलब गन्दगी या कचरा फैलाकर वातावरण को प्रदूषित करने व बीमारी फैलने के लिये कभी न तो सोचते हैं और न तो इसके प्रति कभी अपनी जिम्मेदारी को ही समझते हैं। ऐसे में स्वच्छता के प्रति हम कैसे स्वयं को समर्पित कर पाएंगे, यह समझने की आवश्यकता है। वहीं अन्य देषों के बारे में देखने व सुनने को मिला ही होगा कि चाहे मन्त्री, अफसर हो या साधारण व्यक्ति सभी में स्वच्छता के प्रति एक ही विचार पाया जाता है कि गन्दगी को वहाँ फेकें जहाँ फेंकने का इसका स्थान है। न कि गन्दगी करके भाग खड़े हों बल्कि उसे सही जगह पर ही डालें। ऐसे ही शुद्ध विचार अपने आप को भी रखने की आवष्यकता है।
          स्वच्छता अभियान में भी भ्रष्टाचार बाधा
इस अभियान के तहत घरों, पंचायत घरों, आंगनबाड़ी केन्द्रों एवं स्कूलों में शौचालयों का निर्माण कराने की प्राथमिकता दी गई। सरकारी योजनाओं की अन्य निर्माण विषयों की जो हालत देखने में आती है कुछ वैसा ही हाल इस योजना का भी हुआ है। इस योजना के तहत साफ-सफाई में जो लक्ष्य हासिल करना था वह नहीं किया जा सका। केवल कागजों एवं दिखावे तक ही सिमित रह गया। इसका कारण मुख्य रूप से भ्रष्टाचार, शासन-प्रशासन में इसके प्रति इच्छाशक्ति की कमी, आलस्य और रुचि का न होना है। सरकार की स्वच्छता की पहल जहाँ विकास की धारा को आगे बढ़ाने में कारगर साबित होगी वहीं पर सामाजिक परिववर्तन के लिए भी यह मील का पत्थर साबित हो सकता है लेकिन यह केवल केन्द्र सरकार की एक योजना या महज अभियान ही बन कर न रह जाएँ।

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