लेख : आधुनिक कल्याणकारी राज्य में इस्लाम और मुसलमान की स्थिति ————————————-

लेख : आधुनिक कल्याणकारी राज्य में इस्लाम और मुसलमान की स्थिति ————————————–( निर्मल कुमार )लेखक सामाजिक और राजनैतिक मामलों के जानकार हैं।यह उनके निजी विचार हैं।) —————————

सामाजिक सुरक्षा और जनकल्याण किसी भी न्यायपूर्ण और मानवीय समाज की रीढ़ होते हैं। कोई भी राष्ट्र या समुदाय इन सिद्धांतों को अपनाए बिना तरक्की नहीं कर सकता।

इस्लाम में गरीबी मिटाना और जरूरतमंदों की मदद करना केवल ‘दान’ या अहसान का काम नहीं है, बल्कि इसे व्यक्ति और राज्य दोनों की नैतिक व सामाजिक जिम्मेदारी माना गया है।आज के लोकतांत्रिक देशों (जैसे भारत) ने गरीबी कम करने, भोजन की सुरक्षा, बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा-रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए कई कल्याणकारी योजनाएँ शुरू की हैं। आज के समय में मुस्लिम युवाओं को किसी भी तरह के नकारात्मक या विभाजनकारी तत्वों के प्रभाव में आने के बजाय गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी जैसी बुनियादी समस्याओं के खिलाफ लड़ना चाहिए। उन्हें सरकार, सामाजिक संस्थाओं और व्यक्तिगत स्तर पर चल रहे कल्याणकारी कार्यों में बढ़-चढ़कर सहयोग करना चाहिए।आज की खुली अर्थव्यवस्था (Open Economy) में रचनात्मक कार्यों और तरक्की के अनगिनत अवसर हैं। लोगों को सरकारी योजनाओं के प्रति जागरूक करना और उन्हें लाभ दिलाना एक बड़ी जिम्मेदारी है। यदि समाज को मजबूत और समृद्ध बनना है, तो शिक्षा और रोजगार में अपनी भागीदारी बढ़ानी होगी। किसी भी कल्याणकारी योजना की सफलता सिर्फ कागजी नीतियों पर नहीं, बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि वह आम लोगों तक कितनी आसानी, जागरूकता, प्रशासनिक ईमानदारी और जवाबदेही के साथ पहुँच रही है।इस्लामी दृष्टिकोण और सामाजिक न्यायइस्लाम एक ऐसे समाज की कल्पना करता है जहाँ शक्तिशाली लोग कमजोरों का सहारा बनें और संपन्न लोग गरीबों की मदद करें। क़ुरआन और पैगम्बर मुहम्मद साहब की शिक्षाएँ मानव गरिमा, सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता पर सबसे ज्यादा जोर देती हैं।कल्याण का दायरा: इस्लाम में सामाजिक सुरक्षा का मतलब समाज के हर कमजोर वर्ग—जैसे गरीब, विधवा, अनाथ, मुसाफिर, मजदूर, बुजुर्ग और लाचार लोगों की सम्मानजनक देखभाल करना है।क़ुरआन की सूरह अल-हश्र (59:7) में स्पष्ट कहा गया है कि:”धन केवल अमीरों के बीच ही घूमता न रहे।”क़ुरआन विशेष रूप से समाज के जिन वर्गों की सहायता पर बल देता है, वे हैं:गरीब और जरूरतमंदअनाथ (Orphans)मुसाफिर और विस्थापित (Homeless)देश छोड़ चुके प्रवासी (Immigrants)इससे साफ है कि लोक-कल्याण केवल एक दया का काम नहीं, बल्कि वंचितों का सामाजिक अधिकार और सक्षम लोगों का धार्मिक दायित्व है।मदीना का संविधान: कल्याणकारी राज्य की पहली लिखित आधारशिलासन 622 ईस्वी में पैगम्बर मुहम्मद साहब द्वारा तैयार किया गया ‘मदीना का संविधान’ (Constitution of Medina) दुनिया का पहला लिखित सामाजिक और राजनीतिक दस्तावेज माना जाता है। इसने न्याय, आपसी सहयोग और सुरक्षा के आधार पर मुसलमानों, यहूदियों और अन्य कबीलों के संबंधों को तय किया। इसके प्रमुख स्तंभ निम्नलिखित हैं:1. नागरिकों की समानताधार्मिक और कबीलाई मतभेदों के बावजूद मदीना के सभी समूहों को एक ही राजनीतिक समुदाय (उम्मत) का हिस्सा माना गया। इसने समान नागरिक गरिमा, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और कानून के शासन की मजबूत नींव रखी।2. सामूहिक सुरक्षा और पारस्परिक सहायताइस संविधान ने कमजोरों की रक्षा और वित्तीय सहयोग को राज्य की जिम्मेदारी बनाया। इसके तीन मुख्य आधार थे:सामाजिक एकजुटता: पूरा समाज एक दूसरे के सुख-दुख में शामिल हो।सार्वजनिक उत्तरदायित्व: समाज के कमजोर हिस्से की जिम्मेदारी सब पर हो।सहयोग से कल्याण: मिल-जुलकर संकटों का सामना करना।यहाँ से राज्य केवल शासकों की सत्ता का साधन नहीं रहा, बल्कि जनता के कल्याण का जवाबदेह बन गया।3. शासन का आधार: न्यायसंविधान ने हर तरह के उत्पीड़न और शोषण को खारिज कर दिया। विवादों के निपटारे के लिए न्याय को सर्वोपरि माना गया, जिसके सिद्धांत थे:कानून के सामने सब बराबर (समान जवाबदेही)कमजोरों को शोषण से सुरक्षान्याय तक सबकी आसान पहुँचआपसी विवादों का शांतिपूर्ण हल4. आर्थिक जिम्मेदारीमदीना के संविधान ने संकट के समय पूरे समुदाय को मिलकर आर्थिक बोझ उठाने के लिए बाध्य किया। यह व्यवस्था आज की आधुनिक अवधारणाओं से मेल खाती है, जैसे:सामाजिक बीमा (Social Insurance)सामुदायिक कल्याण कोष (Community Welfare Fund)संकट के समय सार्वजनिक वित्तीय सहायताआधुनिक लोकतंत्र (भारत) और कल्याणकारी योजनाएँभारत जैसे आधुनिक लोकतंत्र में जनकल्याण के लिए कई योजनाएँ चलाई जा रही हैं, जिनमें सब्सिडी, सीधे बैंक खाते में पैसा भेजना (DBT), रोजगार गारंटी (मनरेगा), मुफ्त/सस्ती स्वास्थ्य सेवाएँ, राशन प्रणाली (PDS), आवास योजना और मुफ्त शिक्षा कार्यक्रम शामिल हैं।इस्लाम और लोकतांत्रिक मूल्य दोनों इस बात पर सहमत हैं कि ये योजनाएँ बिना किसी भेदभाव, भ्रष्टाचार या पक्षपात के पूरी गरिमा के साथ हकदार व्यक्ति तक पहुँचनी चाहिए।किसी भी कल्याणकारी योजना की सफलता मुख्य रूप से तीन बातों पर टिकी होती है:पहुँच (Accessibility): योजना का आम लोगों तक आसानी से पहुँचना।जागरूकता (Awareness): जनता को अपने अधिकारों और योजनाओं की सही जानकारी होना।प्रभावशीलता (Effectiveness): बिना भ्रष्टाचार के पूरा लाभ सीधे लाभार्थी को मिलना।धरातल की चुनौतियाँ और हमारा कर्तव्यभारत जैसे विशाल देश में दूर-दराज के गाँवों और गरीबों तक सरकारी लाभ पहुँचाना एक बहुत बड़ी चुनौती है। डिजिटल गवर्नेंस और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) से पारदर्शिता तो आई है, लेकिन इंटरनेट की कमी, तकनीकी अज्ञानता और जटिल कागजी प्रक्रियाएँ आज भी बड़ी बाधाएँ हैं। इसलिए, कल्याणकारी व्यवस्था को सिर्फ ‘प्रक्रिया-केंद्रित’ (File-oriented) होने के बजाय ‘जन-केंद्रित’ (People-centric) होना चाहिए।दस्तावेज़ीकरण और जागरूकता का अभावहाशिए पर रह रहे समुदायों (जैसे प्रवासी मजदूर, बेघर लोग, बुजुर्ग और अल्पसंख्यक) के सामने सबसे बड़ी समस्या जरूरी कागजातों का न होना है। पहचान पत्र, आय प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण या बैंक खाता न होने के कारण वे चाहकर भी सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले पाते।साथ ही, अशिक्षा और सही जानकारी न होने के कारण लोग अपने अधिकारों से महरूम रह जाते हैं।एक आह्वान शिक्षित समाज से :नीति (Policy) और उसके क्रियान्वयन (Implementation) के बीच की इस दूरी को पाटना हम सबकी जिम्मेदारी है। समाज के पढ़े-लिखे और सक्षम लोगों का यह कर्तव्य है कि वे आगे आएं और:गरीब और जरूरतमंद लोगों के जरूरी दस्तावेज (पहचान पत्र, बैंक खाते आदि) बनवाने में मदद करें।सरकारी योजनाओं की सही जानकारी आम लोगों तक सरल भाषा में पहुँचाएँ।युवाओं को शिक्षा और रोजगार के प्रति प्रेरित करें ताकि समाज आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सके।लोगों की इन व्यावहारिक बाधाओं को दूर करना और उन्हें उनके हक का लाभ दिलाना केवल एक सामाजिक जिम्मेदारी ही नहीं, बल्कि एक सच्चा मानवीय और धार्मिक कर्तव्य भी है।

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