आपातकाल: जब लोकतंत्र जेल की सलाखों के पीछे था, लेकिन राष्ट्रभक्तों का हौसला नहीं टूटा— कृष्ण कुमार राय, पूर्व प्रदेश महामंत्री, भारतीय जनता पार्टी

25 जून 1975… यह केवल एक तारीख नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह काला अध्याय है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। उस रात सत्ता के अहंकार ने संविधान की आत्मा को कुचल दिया। पूरे देश में आपातकाल लागू हुआ, नागरिकों के मौलिक अधिकार छीन लिए गए, न्यायपालिका पर दबाव बनाया गया, प्रेस की आवाज़ पर ताले जड़ दिए गए और लोकतंत्र की रक्षा के लिए आवाज़ उठाने वालों को जेलों में ठूंस दिया गया।आज की युवा पीढ़ी ने उस दौर को देखा नहीं है, इसलिए उनका यह जानना आवश्यक है कि लोकतंत्र हमेशा से इतना मजबूत नहीं था। इसे बचाने के लिए हजारों लोगों ने अपना जीवन, सम्मान और स्वतंत्रता दांव पर लगा दी थी। देशभर में लाखों कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, विद्यार्थी और विपक्ष के नेता मीसा (MISA) और डीआईआर (DIR) जैसे कड़े कानूनों के तहत बिना किसी अपराध के महीनों और वर्षों तक जेलों में बंद रखे गए। उनका एकमात्र “अपराध” यह था कि उन्होंने तानाशाही के सामने झुकने से इनकार कर दिया था।मेरे लिए आपातकाल केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि परिवार की पीड़ा और संघर्ष का हिस्सा है। मेरे पूज्य पिताजी, स्वर्गीय जगदीश राय जी, भी उन मीसा बंदियों में शामिल थे जिन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए जेल की यातनाएँ सही। परिवार ने कठिन समय देखा, आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयाँ झेलीं, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों और राष्ट्रहित से कभी समझौता नहीं किया। उनका संघर्ष आज भी मुझे यह प्रेरणा देता है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए हर कीमत चुकानी पड़े, तो भी पीछे नहीं हटना चाहिए।देश के हर राज्य में ऐसे असंख्य लोकतंत्र सेनानी थे जिन्होंने बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के तानाशाही का विरोध किया। अनेक लोगों के परिवार बिखर गए, रोजगार छिन गए, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई, लेकिन लोकतंत्र के लिए उनका विश्वास कभी नहीं टूटा। आज जब हम स्वतंत्र वातावरण में अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं, तब हमें उन मीसा बंदियों और लोकतंत्र सेनानियों का स्मरण अवश्य करना चाहिए, जिनके संघर्ष ने भारत के लोकतंत्र को फिर से जीवित किया।सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस कांग्रेस ने लोकतंत्र का गला घोंटा, वही आज लोकतंत्र की दुहाई देती है। इतिहास को झुठलाया नहीं जा सकता। प्रेस पर सेंसरशिप, विपक्ष का दमन, न्यायपालिका पर दबाव और नागरिक अधिकारों का हनन—ये सब उसी कांग्रेस शासन की पहचान रहे हैं। लोकतंत्र में असहमति देशद्रोह नहीं होती, बल्कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति होती है। दुर्भाग्य से आपातकाल के दौरान असहमति को अपराध बना दिया गया था।आज आवश्यकता इस बात की है कि नई पीढ़ी इतिहास के इस अध्याय को केवल परीक्षा के प्रश्न की तरह नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी सीख के रूप में पढ़े। यदि नागरिक सजग नहीं रहेंगे, यदि संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान नहीं करेंगे, तो इतिहास स्वयं को दोहराने का प्रयास कर सकता है। इसलिए आपातकाल की बरसी केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प लेने का दिन है।आज भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लोकतांत्रिक मूल्यों, पारदर्शिता और जनभागीदारी को सशक्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह हम सभी का दायित्व है कि लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने वाले प्रत्येक मीसा बंदी, प्रत्येक लोकतंत्र सेनानी और उन परिवारों को नमन करें जिन्होंने राष्ट्रहित में कष्ट सहकर भी लोकतंत्र की लौ बुझने नहीं दी।मैं विशेष रूप से युवाओं से कहना चाहता हूँ कि स्वतंत्रता केवल विरासत नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान नहीं करता, बल्कि जागरूक नागरिक करते हैं। इसलिए आपातकाल के इतिहास को जानिए, लोकतंत्र सेनानियों के त्याग को समझिए और यह संकल्प लीजिए कि भारत की लोकतांत्रिक चेतना पर भविष्य में कभी भी तानाशाही की छाया नहीं पड़ने देंगे।लोकतंत्र हमें सहज नहीं मिला है। इसके पीछे अनगिनत मीसा बंदियों की यातनाएँ, लोकतंत्र सेनानियों का संघर्ष और लाखों देशभक्तों का अदम्य साहस छिपा है। यही इतिहास आज की पीढ़ी को जानना और याद रखना चाहिए।

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