शिक्षा-संस्कृत-भाषा-तकनीक सहित विभिन्न क्षेत्र में काम करने वाला एकमात्र विश्वविद्यालय है:– शैलेश-पांडेय पूर्व विधायक।
रेखा-देवार को शारदा चौबे लोक कला सम्मान से सम्मानित किया गया।

**दिनांक:-17/02/2026**मोहम्मद जावेद खान हरित छत्तीसगढ़।।**करगीरोड कोटा:-रमन लोक कला महोत्सव के चौथे दिन विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित वार्षिक उत्सव ने पूरे वातावरण को उत्साह से भर दिया सुबह से ही छात्र-छात्राओं में वार्षिकउत्सव को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिला..पारंपरिक परिधानों से सजे विद्यार्थियों ने मंच संभालते ही दर्शकों को अपने प्रस्तुति से उपस्थित जनों को मंत्रमुग्ध कर दिया..कार्यक्रमों की शुरुआत देशभक्ति गीतों और समूह नृत्य से हुई जिसने उपस्थित जनसमूह में राष्ट्रप्रेम की भावना का संचार किया..विद्यार्थियों ने एकल नृत्य-सामूहिक नृत्य-एकल गायन और सामूहिक गायन के माध्यम से अपनी सृजनात्मकता और मंचीय-आत्मविश्वास का प्रभावी प्रदर्शन किया।

छत्तीसगढ़ी-ओड़िया-बंगाली राजस्थानी और अन्य राज्यों की लोक संस्कृतियों पर आधारित प्रस्तुतियों ने भारत की सांस्कृतिक विविधता को जीवंत रूप में मंच पर उतार दिया..नृत्य प्रस्तुतियों में भाव-भंगिमा, ताल और लय का अद्भुत समन्वय देखने को मिला..वहीं गायन प्रस्तुतियों में सुरों की मधुरता ने उपस्थित श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया..कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों का जोश तालियों की गूंज और दर्शकों की निरंतर सहभागिता माहौल को उत्सव मय बनाए रही..

देर रात तक चले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में युवा कलाकार गीत-संगीत में डूबे रहे, वार्षिकउत्सव विद्यार्थियों के लिए अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच ही नहीं बल्कि आत्मविश्वास, टीमवर्क और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करने का सशक्त माध्यम भी बना।

शिक्षा-संस्कृत-भाषा-तकनीक सहित विभिन्न-क्षेत्र में काम करने वाला एकमात्र-विश्वविद्यालय है:– शैलेश पांडेय पूर्व विधायक बिलासपुर।

इस दौरान विश्वविद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे ने कहा कि ब्रह्मलोक-कला की कल्पना छत्तीसगढ़ से प्रारंभ की गई थी, आज यह महोत्सव राष्ट्रीय स्तर तक है, आने वाले वर्ष में यह महोत्सव वैश्विक-स्तर का होगा उन्होंने कहा कि यह आयोजन बहुत ही सराहनीय है..भावी युवा-पीढ़ी को लोककला संस्कृति भाषा से जुड़ाव होना जरूरी है ।
वही अतिथि के रूप में उपस्थित बिलासपुर के पूर्व विधायक व डॉ.सीवी रमन-विश्वविद्यालय के पूर्व रजिस्टर रहे शैलेश पांडे ने कहा कि कहा कि डॉ.सीवी रमन विश्वविद्यालय शिक्षा संस्कृत भाषा-तकनीक सहित विभिन्न क्षेत्र में काम करने वाला एकमात्र विश्वविद्यालय है..जिसके पास इस तरह की समग्रता है..किसी भी संस्थान का विकास उसके शैक्षणिक विविधता और समग्रता से ही सुनिश्चित होता है..उन्होंने विश्वविद्यालय के प्रगति की कामना की इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर प्रदीप कुमार घोष वैशाली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर समित तिवारी, कुलसचिव डॉक्टर अरविंद कुमार तिवारी संकुलपति डॉक्टर जयंती चटर्जी उपस्थित थे।**प्रसिद्ध त्योहार गायिका रेखा देवार को शारदा चौबे लोककला से सम्मानित हुई:—**प्रतिवर्ष रमन-लोककला महोत्सव में प्रदान किए जाने वाला शारदा चौबे लोककला सम्मान इस बार प्रसिद्ध त्योहार गायिका रेखा देवार को प्रदान किया गया..उन्हें सम्मान पत्र के साथ नगद राशि पुरस्कार किया गया।**पद्म-संवाद में पद्म-सम्मानित विभूतियों ने साझा किए संघर्ष:–**लोक कला संरक्षण, साधना और समाज सेवा की प्रेरक गाथाएँ महोत्सव के समानांतर सत्र में पद्म संवाद का आयोजन किया गया, जिसमें छत्तीसगढ़ की पद्म सम्मानित विभूतियों ने अपने जीवन अनुभव और संघर्षों को साझा किया..छत्तीसगढ़ की लोक कला एवं संस्कृति के संरक्षण में विशिष्ट योगदान के लिए पद्मश्री से अलंकृत रामलाल बैरेट ने कहा कि उन्हें जो भी उपलब्धि मिली है..वह गुरुकृपा का परिणाम है..उन्होंने महाराजा चक्रधर से कथक सीखने की अपनी यात्रा को याद करते हुए कहा कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती..वे पाँच वर्ष की आयु से सीख रहे हैं..और आज भी सिखा रहे हैं..आदिवासी लोककला और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण व प्रचार प्रसार के लिए पद्मश्री से सम्मानित अजय मांडवी ने स्वयं को एक साधारण कलाकार बताते हुए कहा कि शांति और धैर्य ही सफलता की दिशा तय करते हैं.. वे पिछले 16 वर्षों से जेलों में कार्य कर मुख्यधारा में लौटने वाले नक्सल प्रभावित लोगों को कला के माध्यम से नई राह दिखा रहे हैं उनका मानना है,कि सकारात्मक कार्य कई गुना होकर समाज में लौटता है..बिरहोर और पहाड़ी कोरबा जनजातियों के उत्थान के लिए समर्पित जागेश्वर यादव ने बताया कि निरंतर प्रयासों से आज बड़ी संख्या में परिवारों को स्थायी आवास मिल सका है..उन्होंने कहा कि अभी भी शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में लंबा रास्ता तय करना है पर जब तक जीवन है..वे सेवा करते रहेंगे..पद्मश्री राधेश्याम बारले ने भी अपने अनुभव साझा करते हुए लोक कला के प्रति अपनी निस्वार्थ-साधना और समर्पण को व्यक्त किया..कार्यक्रम का संचालन डॉ.ब्रह्मेश श्रीवास्तव ने किया।**छत्तीसगढ़ी-फिल्मों का संसार सिनेमा और समाज के रिश्ते पर मंथन:—–**वैचारिक-सत्र में “छत्तीसगढ़ी फिल्मों का संसार” विषय पर फिल्म जगत से जुड़े विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे..वरिष्ठ फिल्म निर्माता एवं निर्देशक तथा छत्तीसगढ़ी सिनेमा एवं टीवी प्रोग्राम निर्माता संघ के अध्यक्ष संतोष जैन ने कहा कि फिल्म और साहित्य समाज को समझने का सशक्त माध्यम हैं..फिल्म निर्माता एवं निर्देशक मनोज वर्मा ने कहा कि सिनेमा और समाज एक-दूसरे के दर्पण है..कहानियाँ समाज से निकलती हैं..और फिर उसी तक लौटती हैं..निर्देशक ज्ञानेश तिवारी ने वर्तमान दौर में बदलती विषयवस्तु पर चर्चा करते हुए कहा कि आज प्रेम प्रधान फिल्मों की संख्या बढ़ी है..और क्या स्वीकार करना है,यह समाज की इच्छा पर निर्भर करता है..इस अवसर पर भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत ट्रस्ट के संयोजक अरविंद मिश्रा ने कहा कि रोटी-कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के बाद मनोरंजन की आवश्यकता महसूस हुई जिससे रामायण रामलीला और लोककला की परंपरा विकसित हुई और आगे चलकर सिनेमा का उदय हुआ उन्होंने कहा कि सिनेमा के बिना समाज की समझ अधूरी रह जाएगी..कार्यक्रम का संचालन श्वेता पांडे ने किया।
